भारतकोश
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

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पृष्ठ 174

सप्तदशोऽध्यायः (113) —————————————————————————————— उपासकस्तु शुद्धात्मा गुरुं यत्नेन तोषयेत्। स्वचित्तवित्तकायैश्च भक्तिश्रद्धासमन्वितः ॥२॥ साधक शुद्ध चित्त से भक्ति और श्रद्धापूर्वक अपने तन, मन और धन से गुरु को यत्नपूर्वक सन्तुष्ट करे। यदा ददाति सन्तुष्टः प्रसन्नवदनो मनुम्। स्वयमेव तथा चैवमिति कर्त्तव्यताक्रमः॥३॥ गुरु संतुष्ट होकर प्रसन्न मुख से स्वयं वर प्रदान करनेवाला मन्त्र शिष्य को देते हैं, यह कर्तव्य का क्रम है। विशुद्धकाले देशेषु शुद्धात्मा नियतो गुरुः। संकल्प्योपोष्य कर्त्तव्यमङ्कुरारोपणं मुने॥४॥ हे मुने! पवित्र समय में पवित्र स्थलों पर निर्मल चित्त वाले तथा नियमों का पालन करते हुए गुरु संकल्प एवं उपवास कर बीजारोपण करें। कुर्य्यान्नान्दीमुखश्राद्धमादौ च स्वस्तिवाचनम्। स्वगृह्योक्तप्रकारेण¹ तदेतद् विदधीत वै॥५॥ सबसे पहले अपने गृह्यसूत्र की विधि से नान्दीमुख श्राद्ध करे, तब स्वस्तिवाचन करें। तब यह कर्तव्य करना चाहिए। मधुमासे भवेद् दुःखं माधवे रत्नसञ्चयः। मरणं भवति ज्येष्ठे आषाढे बन्धुनाशनम् ॥६॥ समृद्धिः श्रावणे न्यूनं भवेद् भाद्रपदे क्षयः। प्रजानामाश्विने मासे सर्वतः शुद्धिमेव हि॥७॥ ज्ञानं स्यात् कार्तिके सौख्यं मार्गशीर्षे भवेदपि। पौषे ज्ञानक्षयो माघे भवेन्मेधाविवर्द्धनम् ॥८॥ फाल्गुने तु समृद्धिः स्यान्मलमासं विवर्जयेत्। चैत्र मास में दुख, वैशाख में रत्न-संग्रह, ज्येष्ठ में मृत्यु, आषाढ में बन्धु- नाश, श्रावण में अल्प समृद्धि, भाद्रपद में नाश, आश्विन मास में सन्तति की शुद्धि, कार्तिक मास में ज्ञान, अग्रहण में सुख, पौष में ज्ञान का क्षय तथा माघ मास में

  1. घ. विधानेन।