अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 175, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ें(114) अगस्त्य-संहिता दीक्षा लेने से ज्ञान-वृद्धि तथा फाल्गुन में समृद्धि की प्राप्ति होती है। दीक्षा-ग्रहण में मलमास का त्याग करना चाहिए। रवौ गुरौ सिते सोमे कर्त्तव्यं बुधशुक्रयोः ।।9।। शुक्लपक्ष में रवि, गुरु, सोम, बुध और शुक्र को दीक्षा लेनी चाहिए। अश्विनी रेवती¹ स्वाती विशाखा हस्त एव च।² पुष्यं शतभिषक् चैव श्रवणा च धनिष्ठिका।³ ।।10।। ज्येष्ठोत्तरात्रयेष्वेव कुर्यान्मन्त्राभिषेचनम्। अश्विनी, रेवती, स्वाती, विशाखा, हस्त, पुष्य, शतभिषा, श्रवणा, धनिष्ठा, ज्येष्ठा एवं उत्तरात्रय इन नक्षत्रों में मन्त्राभिषेक करना चाहिए। पूर्णिमा पञ्चमी चैव द्वितीया सप्तमी तथा ।।11।। द्वादश्यामपि कर्त्तव्यं षष्ठयामपि विशेषतः ।⁴ त्रयोदशी च नवमी⁵ प्रशस्ताः सर्वकामदाः ।।12।। पूर्णिमा, पंचमी, द्वितीया, सप्तमी, द्वादशी, षष्ठी, त्रयोदशी और नवमी तिथियाँ प्रशस्त हैं, ये सभी कामनाओं की पूर्ति करती हैं। पञ्चाङ्गशुद्धदिवसे सोदये शशितारयोः। गुरुशुक्रोदये शुद्ध-लग्ने द्वादशशोधिते ।।12।। चन्द्रतारानुकूले च शस्यते सर्वकर्मसु । तिथि, वार, नक्षत्र, योग एवं करण इन पांचों अंगों की से पवित्र दिन में चन्द्रमा और नक्षत्रों के उदित रहने पर, गुरु एवं शुक्र के उदित रहने पर, शुद्ध लग्न एवं द्वादश लग्नों का शोधन कर चन्द्र एवं नक्षत्र के अनुकूल समय में दीक्षा सभी कर्मों में प्रशस्त होती है। सूर्यग्रहणकाले तु नेदमनवेषणं भवेत् ।।13।। सूर्यग्रहणकालेन समानो नास्ति कञ्चन । तत्र यद्यत् कृतं सर्वमनन्तफलं भवेत् ।।14। न मासतिथिवारादिशोधनं सूर्य्यपर्वणि । ददातीष्टं गृहीतं यत् तस्मिन् काले मुनीश्वर ।।15।।
- घ. रोहिणी। 2. घ. हस्तभेषु च। 3. घ. में अनुपलब्ध। 4. घ. में अनुपलब्ध।
- घ. दशमी। Rarest Archiver