अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ
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सप्तदशोऽध्यायः (115) सिद्धिर्भवति मन्त्रस्य विनायासेन वेगतः। अतस्तत्रैव रामस्य मन्त्रतीर्थाभिषेचनम्।।16।। सूर्यग्रहण के समय में इन योगों का अन्वेषण नहीं किया जाता है। सूर्यग्रहण के समान कोई काल नहीं है। उस समय में जो कर्म किये जाते हैं, उनसे अनन्त फल मिलता है। मास, तिथि, दिन आदि की अपेक्षा सूर्यग्रहण में नहीं होता। इस समय जो मन्त्र-ग्रहण किया जाता है, वह सभी इच्छित वस्तुओं को पूरा करता है। बिना प्रयास का ही वह मन्त्र सिद्ध हो जाता है; अतः सूर्यग्रहण के समय में ही श्रीराम के मन्त्ररूपी तीर्थ से अभिषेक करना चाहिए। कतव्यं सर्वयत्नेन मन्त्रसिद्धिमभीप्सुभिः। चतुर्भिर्वर्णकैः सम्यक् नीलपीतसितासितैः।।17।। पूर्ववन्मण्डलं कृत्वा तत्र धान्याञ्जलिद्वयम्। नारिकेलफलोपेतं माङ्गलैः परितोज्ज्वलम्। निधाय कलशं तत्र तीर्थतोयसुपूरितम्।।18।। ¹वेष्टितं वस्त्रयुग्मेन पञ्चरत्नसमन्वितम्। आम्राश्वत्थप्रसूताभिः शाखाभिरुपशोभितम्।।19।। नारिकेलफलोपेतं मण्डलैः परितोज्ज्वलम्। सर्वोत्सवसमायुक्तं कृत्वा तत्रार्चयेद्धरिम्।।20।। मन्त्र सिद्धि की इच्छा रखनेवाले सभी प्रकार के उपाय करें। नीले, पीले, उजले एवं काले इन चारों रंगों के सुगन्धित पदार्थों से पूर्वोक्त विधि से यन्त्र का निर्माण कर बीच में दो अंजलि धान रखकर उस पर नारियल के फल से युक्त तथा मंगलमय पदार्थों को उसके चारों ओर रखकर कलश स्थापित कर तीर्थ के जले से भली भाँति भर दें। उसमें पंचरत्न डालकर जोड़ा वस्त्र से लपेट दें। कलश को आम और पीपल की शाखाओं से सुसज्जित करें। नारिकेल के फल से भी सुज्जित कर दीप जलाकर तथा इसे चारो ओर से घेरकर सभी प्रकार का उत्सव करते हुए वहाँ श्रीहरि की अर्चना करें। ऋग्यजुःसामसूक्तैश्च स्मार्तैः पौराणिकैरपि। मन्त्रैरागमिकैश्चैव वैष्णवैर्देवमर्चयेत्।।21।। ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद के सूक्तों से स्मृति और पुराणों तथा आगम के विष्णु-मन्त्रों से देवता की अर्चना करें।
- घ. यहाँ से चार चरण घ. में अनुपलब्ध।