अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ
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(116) अगस्त्य-संहिता
वरयेद् ब्राह्मणान् वासः कुण्डलाङ्गुलिभूषणैः। श्रावयेत् तैः सुसूक्तानि मन्त्रान् विष्णूत्सवे मुने।।२२।। इसके बाद वस्त्र, कुण्डल, अंगूठी और अन्य आभूषणों से ब्राह्मणों का वरण करें और उनसे इस विष्णु के समारोह में सुन्दर सूक्तों को सुनाएँ। गुरुः पूर्वोक्तविधिना भूतशुद्ध्याद्यमाचरेत्। न्यासजालं प्रविन्यस्य पूजयेत् तत्र पूर्ववत्।।२३।। पूजनीयैश्च पूर्वोक्तसाधनैः पुरुषोत्तमम्। पूर्वोक्तनृत्यगीताद्यैरुत्सवं तत्र कारयेत्।।२४।। गुरु पूर्वोक्त विधि से भूतशुद्धि आदि करें तथा सभी न्यासों को कर के वहाँ पूर्वोक्त विधि से पूजन करें। पूर्वोक्त पूजा सामग्रियों से विष्णु की पूजा करें तथा पूर्वोक्त नृत्य, गीत, वाद्य आदि से वहाँ उत्सव करें। पुण्यस्त्रीभ्यो गृहस्थेभ्यो दद्यात् सुबहुविस्तरम्। गन्धपुष्पाम्बु ताम्बूलं सद्वासो भूषणादिकम्।।२५।। भोजनञ्चान्नपानीयैरन्येभ्योऽपि तपोनिधे। इस समारोह में पवित्र स्त्रियों और गृहस्थों को चन्दन, पुष्प, जल, पान, सुन्दर वस्त्र, गहने, भोजन, अन्न, पेय पदार्थ आदि दें तथा दूसरे को भी ये वस्तुएँ प्रदान करें। एवं तत्रोत्सवं कृत्वा रात्रौ जागरणं चरेत्।।२६।। एवं दिवा च रात्रौ च त्रिकालं पूजयेत् प्रभुम्। इस प्रकार उत्सव कर रात्रि में जागरण करें। इस तरह दिन और रात्रि में तीनों समय प्रभु का पूजन करें। षट्सहस्रं जपेन्मन्त्रं¹ पूजान्तेऽहर्निशं मुने।।२७।। परेऽहनि तथा प्रातः पूर्ववत्सर्वमाचरेत्। दिन-रात पूजा के अन्त में छह हजार मन्त्र का जप करें। दूसरे दिन भी प्रातःकाल में पूर्व दिन के अनुसार ही सारे कर्म करें। सम्पूज्य विधिवद्राममग्निकार्यमथाचरेत्।।२८।। पूर्ववत् कुण्डमुत्खाय कुर्य्यात् तत्रापि मण्डलम्। तत्राप्यग्निं समाधाय रामं तत्रार्चयेत् प्रभुम्²।।२९।।
१. घ. जपेत् तत्र। २. घ. हरिम्।