भारतकोश
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

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पृष्ठ 178

सप्तदशोऽध्यायः (117) साङ्गावरणमावाह्य पूर्ववच्च यथाविधि। तदग्निस्थापनाद्यं च सर्वं पूर्ववदाचरेत् ।।३०।। दधिदुग्धाज्यसंयुक्तैर्दशांशं जुहुयात् तिलैः। हुत्वा पूर्णाहुतिं कृत्वा ततस्तं कलशेऽर्चयेत् ।।३१।। ततो दिक्षु बलिं दत्वा कृत्यमेतत् समाचरेत्। श्रीराम की विधिवत् पूजाकर तब हवन कार्य आरम्भ करें। पूर्वोक्त विधि से कुण्ड खनकर वहाँ भी यन्त्र बनाएँ। वहाँ अग्नि-स्थापन कर प्रभु श्रीराम की अर्चना करें। पूर्वोक्त विधि से अंग देवता और आवरण देवता का आवाहन कर विधिपूर्वक अर्चना करें और अग्निस्थापन आदि भी पूर्वोक्त विधि से करें। दही, दूध और घी मिलाकर तिल से जप का दशांश हवन करें। हवन कर पूर्णाहुति देकर तब कलश पर प्रभु की अर्चना करें। तब सभी दिशाओं में दिक्पालों को बलि देकर आगे वर्णित कार्य करें। ततः शिष्यमुपानीय भक्तिनम्रमकल्मषम्। प्राणानायम्य¹ विधिवद् भूतशुद्धिं विधाय च ।।३२।। सुरास्त्वामितिमन्त्रेण² बहुभिर्ब्राह्मणैः सह।

  1. घ. प्राणायामञ्च।
  2. 'सुरास्त्वां' इत्यादि मन्त्र इस प्रकार है- सुरास्त्वामभिसिञ्चन्तु ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः। वासुदेवो जगन्नाथस्तथासङ्कर्षणो विभुः।। प्रद्युम्नश्चानिरुद्धश्च भवन्तु विजयाय ते। आखण्डलोऽग्निर्भगवान् यमो वै निर्ऋतिस्तथा। वरुणः पवनश्चैव धनाध्यक्षस्तथा शिवः। ब्रह्मणासहितश्शेषो दिक्पालाः पान्तु ते सदा।। कीर्त्तिर्लक्ष्मीर्धृतिर्मेधा पुष्टिः श्रद्धा क्रिया मतिः। बुद्धिर्लज्जावपुः शान्तिस्तुष्टिः कान्तिश्च मातरः।। एतास्त्वामभिसिञ्चन्तु देवपत्न्यस्समागताः। आदित्यश्चन्द्रमाभौमो बुधजीवसितार्कजाः। ग्रहास्त्वामभिसिञ्चन्तु राहुः केतुश्च तर्पिताः। देवदानवगन्धर्वा यक्षराक्षसपन्नगाः। ऋषयो मनवो गावो देवमातर एव च।। देवपत्न्यो द्रुमा नागा दैत्याश्चाप्सरसां गणाः। अस्त्राणि सर्वशस्त्राणि राजानो वाहनानि च।। ओषधानि च रत्नानि कालस्यावयवाश्च ये। सरितस्ससागराः शैलास्तीर्थानि च हृदा नदाः। एतेस्त्वामभिसिञ्चन्तु सर्वकर्मार्थसिद्धये।। -विद्यापति कृत दुर्गाभक्तितरंगिणी का पाठ।