भारतकोश
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

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पृष्ठ 179

(118) अगस्त्य-संहिता

अभिषिञ्चेच्च तन्मूर्ध्नि तदेतत्कलशोदकम् ।।33।। नारायणः स्वयं रामः शिष्ये संनिदधीत वै। सर्वगः सर्वतोऽप्यस्ति प्रसीदति दयानिधिः ।।34।। इति संस्मृत्य संस्मृत्य तज्जलैरभिषेचयेत्। इसके बाद भक्ति के कारण विनीत एवं निष्पाप शिष्य को लाकर विधिवत् प्राणायाम कराकर भूतशुद्धि कर 'सुरास्त्वां.' इत्यादि मन्त्र से अनेक ब्राह्मणों के साथ इस कलश के जल से उसके मस्तक पर अभिषेक करें। स्वयं नारायण श्रीराम इस शिष्य में सन्निहित हों, जो सर्वत्र गमन करनेवाले हैं तथा सभी ओर से वे विराजमान हैं तथा वे दयानिधि प्रसन्न हो रहे हैं'- ऐसा बार-बार स्मरण कर कलश जल छिड़कें। परिधाप्य च वासश्च चन्दनादि विलिप्य च¹ ।।35।। कुण्डले चाङ्गुलीयञ्च धारयित्वा न्यसेत् ततः। वैष्णवीं मातृकां चैव तत्त्वन्यासञ्च पूर्ववत् ।।36।। तन्मूर्तिपञ्जरन्यासऋष्यादिन्यासमेव , च। पूर्ववद् विधिवच्छिष्यतनावेवं प्रविन्यसेत् ।।37।। तब शिष्य को वस्त्र पहनाकर चन्दनादि का लेप कर दोनों कानों में कुण्डल तथा अंगूठी पहना कर पूर्वोक्त विधि से तत्त्वन्यास तथा वैष्णव-मातृका का न्यास करें। श्रीराम का मूर्तिपंजर-न्यास कर ऋष्यादि-न्यास भी पूर्वोक्त विधि से शिष्य के शरीर पर करें। ततस्तच्छिरसि स्वस्य हस्तं दत्वा शतं जपेत्। अष्टोत्तरं ततो मन्त्रं दद्यादुदकपूर्वकम् ।।38।। प्रसन्नवदनस्तस्मै शिष्याय मुनिपुङ्गव । स्वतो ज्योतिर्मयीं विद्यां गच्छन्तीं भावयेद् गुरुः ।।39।। आगतां भावयेच्छिष्यो धन्योऽस्मीति विशेषतः ।।40।। तब शिष्य के शिर पर हाथ रखकर गुरु स्वयं एक सौ आठ बार जप करें तब पहले जल देकर प्रसन्न होकर शिष्य को मन्त्र दें साथ ही गुरु यह भावना करें कि यह ज्योतिःस्वरूप विद्या स्वयं शिष्य के प्रति जा रही है। शिष्य भी यह भावना करें कि विद्या मेरे प्रति आ रही है और इससे मैं धन्य हो गया हूँ।

  1. घ. चन्दनाद्यनुलिप्य च। Rarest Archiver