अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
३. राम-मन्दिर प्रतिष्ठा, विग्रह-लक्षण व उत्सव विधि
सप्तदशोऽध्यायः (115) सिद्धिर्भवति मन्त्रस्य विनायासेन वेगतः। अतस्तत्रैव रामस्य मन्त्रतीर्थाभिषेचनम्।।16।। सूर्यग्रहण के समय में इन योगों का अन्वेषण नहीं किया जाता है। सूर्यग्रहण के समान कोई काल नहीं है। उस समय में जो कर्म किये जाते हैं, उनसे अनन्त फल मिलता है। मास, तिथि, दिन आदि की अपेक्षा सूर्यग्रहण में नहीं होता। इस समय जो मन्त्र-ग्रहण किया जाता है, वह सभी इच्छित वस्तुओं को पूरा करता है। बिना प्रयास का ही वह मन्त्र सिद्ध हो जाता है; अतः सूर्यग्रहण के समय में ही श्रीराम के मन्त्ररूपी तीर्थ से अभिषेक करना चाहिए। कतव्यं सर्वयत्नेन मन्त्रसिद्धिमभीप्सुभिः। चतुर्भिर्वर्णकैः सम्यक् नीलपीतसितासितैः।।17।। पूर्ववन्मण्डलं कृत्वा तत्र धान्याञ्जलिद्वयम्। नारिकेलफलोपेतं माङ्गलैः परितोज्ज्वलम्। निधाय कलशं तत्र तीर्थतोयसुपूरितम्।।18।। ¹वेष्टितं वस्त्रयुग्मेन पञ्चरत्नसमन्वितम्। आम्राश्वत्थप्रसूताभिः शाखाभिरुपशोभितम्।।19।। नारिकेलफलोपेतं मण्डलैः परितोज्ज्वलम्। सर्वोत्सवसमायुक्तं कृत्वा तत्रार्चयेद्धरिम्।।20।। मन्त्र सिद्धि की इच्छा रखनेवाले सभी प्रकार के उपाय करें। नीले, पीले, उजले एवं काले इन चारों रंगों के सुगन्धित पदार्थों से पूर्वोक्त विधि से यन्त्र का निर्माण कर बीच में दो अंजलि धान रखकर उस पर नारियल के फल से युक्त तथा मंगलमय पदार्थों को उसके चारों ओर रखकर कलश स्थापित कर तीर्थ के जले से भली भाँति भर दें। उसमें पंचरत्न डालकर जोड़ा वस्त्र से लपेट दें। कलश को आम और पीपल की शाखाओं से सुसज्जित करें। नारिकेल के फल से भी सुज्जित कर दीप जलाकर तथा इसे चारो ओर से घेरकर सभी प्रकार का उत्सव करते हुए वहाँ श्रीहरि की अर्चना करें। ऋग्यजुःसामसूक्तैश्च स्मार्तैः पौराणिकैरपि। मन्त्रैरागमिकैश्चैव वैष्णवैर्देवमर्चयेत्।।21।। ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद के सूक्तों से स्मृति और पुराणों तथा आगम के विष्णु-मन्त्रों से देवता की अर्चना करें।
- घ. यहाँ से चार चरण घ. में अनुपलब्ध।
(116) अगस्त्य-संहिता
वरयेद् ब्राह्मणान् वासः कुण्डलाङ्गुलिभूषणैः। श्रावयेत् तैः सुसूक्तानि मन्त्रान् विष्णूत्सवे मुने।।२२।। इसके बाद वस्त्र, कुण्डल, अंगूठी और अन्य आभूषणों से ब्राह्मणों का वरण करें और उनसे इस विष्णु के समारोह में सुन्दर सूक्तों को सुनाएँ। गुरुः पूर्वोक्तविधिना भूतशुद्ध्याद्यमाचरेत्। न्यासजालं प्रविन्यस्य पूजयेत् तत्र पूर्ववत्।।२३।। पूजनीयैश्च पूर्वोक्तसाधनैः पुरुषोत्तमम्। पूर्वोक्तनृत्यगीताद्यैरुत्सवं तत्र कारयेत्।।२४।। गुरु पूर्वोक्त विधि से भूतशुद्धि आदि करें तथा सभी न्यासों को कर के वहाँ पूर्वोक्त विधि से पूजन करें। पूर्वोक्त पूजा सामग्रियों से विष्णु की पूजा करें तथा पूर्वोक्त नृत्य, गीत, वाद्य आदि से वहाँ उत्सव करें। पुण्यस्त्रीभ्यो गृहस्थेभ्यो दद्यात् सुबहुविस्तरम्। गन्धपुष्पाम्बु ताम्बूलं सद्वासो भूषणादिकम्।।२५।। भोजनञ्चान्नपानीयैरन्येभ्योऽपि तपोनिधे। इस समारोह में पवित्र स्त्रियों और गृहस्थों को चन्दन, पुष्प, जल, पान, सुन्दर वस्त्र, गहने, भोजन, अन्न, पेय पदार्थ आदि दें तथा दूसरे को भी ये वस्तुएँ प्रदान करें। एवं तत्रोत्सवं कृत्वा रात्रौ जागरणं चरेत्।।२६।। एवं दिवा च रात्रौ च त्रिकालं पूजयेत् प्रभुम्। इस प्रकार उत्सव कर रात्रि में जागरण करें। इस तरह दिन और रात्रि में तीनों समय प्रभु का पूजन करें। षट्सहस्रं जपेन्मन्त्रं¹ पूजान्तेऽहर्निशं मुने।।२७।। परेऽहनि तथा प्रातः पूर्ववत्सर्वमाचरेत्। दिन-रात पूजा के अन्त में छह हजार मन्त्र का जप करें। दूसरे दिन भी प्रातःकाल में पूर्व दिन के अनुसार ही सारे कर्म करें। सम्पूज्य विधिवद्राममग्निकार्यमथाचरेत्।।२८।। पूर्ववत् कुण्डमुत्खाय कुर्य्यात् तत्रापि मण्डलम्। तत्राप्यग्निं समाधाय रामं तत्रार्चयेत् प्रभुम्²।।२९।।
१. घ. जपेत् तत्र। २. घ. हरिम्।
सप्तदशोऽध्यायः (117) साङ्गावरणमावाह्य पूर्ववच्च यथाविधि। तदग्निस्थापनाद्यं च सर्वं पूर्ववदाचरेत् ।।३०।। दधिदुग्धाज्यसंयुक्तैर्दशांशं जुहुयात् तिलैः। हुत्वा पूर्णाहुतिं कृत्वा ततस्तं कलशेऽर्चयेत् ।।३१।। ततो दिक्षु बलिं दत्वा कृत्यमेतत् समाचरेत्। श्रीराम की विधिवत् पूजाकर तब हवन कार्य आरम्भ करें। पूर्वोक्त विधि से कुण्ड खनकर वहाँ भी यन्त्र बनाएँ। वहाँ अग्नि-स्थापन कर प्रभु श्रीराम की अर्चना करें। पूर्वोक्त विधि से अंग देवता और आवरण देवता का आवाहन कर विधिपूर्वक अर्चना करें और अग्निस्थापन आदि भी पूर्वोक्त विधि से करें। दही, दूध और घी मिलाकर तिल से जप का दशांश हवन करें। हवन कर पूर्णाहुति देकर तब कलश पर प्रभु की अर्चना करें। तब सभी दिशाओं में दिक्पालों को बलि देकर आगे वर्णित कार्य करें। ततः शिष्यमुपानीय भक्तिनम्रमकल्मषम्। प्राणानायम्य¹ विधिवद् भूतशुद्धिं विधाय च ।।३२।। सुरास्त्वामितिमन्त्रेण² बहुभिर्ब्राह्मणैः सह।
- घ. प्राणायामञ्च।
- 'सुरास्त्वां' इत्यादि मन्त्र इस प्रकार है- सुरास्त्वामभिसिञ्चन्तु ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः। वासुदेवो जगन्नाथस्तथासङ्कर्षणो विभुः।। प्रद्युम्नश्चानिरुद्धश्च भवन्तु विजयाय ते। आखण्डलोऽग्निर्भगवान् यमो वै निर्ऋतिस्तथा। वरुणः पवनश्चैव धनाध्यक्षस्तथा शिवः। ब्रह्मणासहितश्शेषो दिक्पालाः पान्तु ते सदा।। कीर्त्तिर्लक्ष्मीर्धृतिर्मेधा पुष्टिः श्रद्धा क्रिया मतिः। बुद्धिर्लज्जावपुः शान्तिस्तुष्टिः कान्तिश्च मातरः।। एतास्त्वामभिसिञ्चन्तु देवपत्न्यस्समागताः। आदित्यश्चन्द्रमाभौमो बुधजीवसितार्कजाः। ग्रहास्त्वामभिसिञ्चन्तु राहुः केतुश्च तर्पिताः। देवदानवगन्धर्वा यक्षराक्षसपन्नगाः। ऋषयो मनवो गावो देवमातर एव च।। देवपत्न्यो द्रुमा नागा दैत्याश्चाप्सरसां गणाः। अस्त्राणि सर्वशस्त्राणि राजानो वाहनानि च।। ओषधानि च रत्नानि कालस्यावयवाश्च ये। सरितस्ससागराः शैलास्तीर्थानि च हृदा नदाः। एतेस्त्वामभिसिञ्चन्तु सर्वकर्मार्थसिद्धये।। -विद्यापति कृत दुर्गाभक्तितरंगिणी का पाठ।
(118) अगस्त्य-संहिता
अभिषिञ्चेच्च तन्मूर्ध्नि तदेतत्कलशोदकम् ।।33।। नारायणः स्वयं रामः शिष्ये संनिदधीत वै। सर्वगः सर्वतोऽप्यस्ति प्रसीदति दयानिधिः ।।34।। इति संस्मृत्य संस्मृत्य तज्जलैरभिषेचयेत्। इसके बाद भक्ति के कारण विनीत एवं निष्पाप शिष्य को लाकर विधिवत् प्राणायाम कराकर भूतशुद्धि कर 'सुरास्त्वां.' इत्यादि मन्त्र से अनेक ब्राह्मणों के साथ इस कलश के जल से उसके मस्तक पर अभिषेक करें। स्वयं नारायण श्रीराम इस शिष्य में सन्निहित हों, जो सर्वत्र गमन करनेवाले हैं तथा सभी ओर से वे विराजमान हैं तथा वे दयानिधि प्रसन्न हो रहे हैं'- ऐसा बार-बार स्मरण कर कलश जल छिड़कें। परिधाप्य च वासश्च चन्दनादि विलिप्य च¹ ।।35।। कुण्डले चाङ्गुलीयञ्च धारयित्वा न्यसेत् ततः। वैष्णवीं मातृकां चैव तत्त्वन्यासञ्च पूर्ववत् ।।36।। तन्मूर्तिपञ्जरन्यासऋष्यादिन्यासमेव , च। पूर्ववद् विधिवच्छिष्यतनावेवं प्रविन्यसेत् ।।37।। तब शिष्य को वस्त्र पहनाकर चन्दनादि का लेप कर दोनों कानों में कुण्डल तथा अंगूठी पहना कर पूर्वोक्त विधि से तत्त्वन्यास तथा वैष्णव-मातृका का न्यास करें। श्रीराम का मूर्तिपंजर-न्यास कर ऋष्यादि-न्यास भी पूर्वोक्त विधि से शिष्य के शरीर पर करें। ततस्तच्छिरसि स्वस्य हस्तं दत्वा शतं जपेत्। अष्टोत्तरं ततो मन्त्रं दद्यादुदकपूर्वकम् ।।38।। प्रसन्नवदनस्तस्मै शिष्याय मुनिपुङ्गव । स्वतो ज्योतिर्मयीं विद्यां गच्छन्तीं भावयेद् गुरुः ।।39।। आगतां भावयेच्छिष्यो धन्योऽस्मीति विशेषतः ।।40।। तब शिष्य के शिर पर हाथ रखकर गुरु स्वयं एक सौ आठ बार जप करें तब पहले जल देकर प्रसन्न होकर शिष्य को मन्त्र दें साथ ही गुरु यह भावना करें कि यह ज्योतिःस्वरूप विद्या स्वयं शिष्य के प्रति जा रही है। शिष्य भी यह भावना करें कि विद्या मेरे प्रति आ रही है और इससे मैं धन्य हो गया हूँ।
- घ. चन्दनाद्यनुलिप्य च। Rarest Archiver
सप्तदशोऽध्यायः (119) कृतकृत्यस्ततः शिष्यस्तस्मै सर्वं निवेदयेत्। यच्च यावच्च यद्भक्त्या गुरुवे हृष्टचेतनः।।141।। गोभूहिरण्यं विपिनं गृहं क्षेत्रादिकं मुने। न चेदर्द्धं तदर्द्धं वा दशांशमपि वापि वा।।142।। अक्लेशादन्नवस्त्रादि दद्याद् वित्तानुसारतः।।143।। प्रकारान्तरमालम्ब्य गुरुं यत्नेन तोषयेत्। गुरुपुत्रकलत्रादीन् तोषयेद् बहुभक्तितः¹।।144।। अर्हणादिश्च बहुभिर्भक्त्याच्छादनभूषणैः। तब शिष्य चेतना का दर्शन कर कृतकृत्य होकर प्रसन्न चित्त से गुरु को भक्तिपूर्वक सब कुछ गाय, भूमि, सोना, वन, घर, खेत आदि समर्पित करे। यदि न हो, तो इसका आधा, आधे का आधा या दशांश भी दे। स्वयं कष्ट न कर धन के अनुसार अन्न वस्त्र आदि गुरु को समर्पित करें। अन्य विधि से भी यत्नपूर्वक गुरु को सन्तुष्ट करें। गुरु की पत्नी उनके पुत्र आदि को भी भक्तिभाव से वस्त्राभूषण देकर उनकी पूजा कर सन्तुष्ट करें। एवमुक्तप्रकारेण गुरवे दत्तदक्षिणः। कृतकृत्यं तथात्मानं मत्वा विप्रांश्च भोजयेत्।।145।। तेभ्यश्च² दक्षिणां दत्त्वा सर्वं तत्प्रतिपूजयेत्³। ब्राह्मणाशीर्वचोभिश्च गुर्वाशीर्भिः समेधितः।।146।। विसर्जयेच्च गुर्वादीन् ततो भुञ्जीत मन्त्रवित्। इस प्रकार ऊपर कही गयी विधि से गुरु को दक्षिणा देकर स्वयं को कृतकृत्य मानकर ब्राह्मण भोजन कराएँ। उन्हें दक्षिणा देकर उनका अभिवादन करें। इस प्रकार ब्राह्मणों और गुरु के आशीर्वाद से पवित्र होकर गुरु आदि को विदा करें तब साधक स्वयं भोजन करें। एवं लब्धमनुर्विप्रः कृतार्थः स्यान्न संशयः।।147।। तदादि संध्यां कुर्वीत नियतो गुर्वनुज्ञया। सायं प्रातश्च मध्याह्ने रामं ध्यात्वा मनुं जपेत्।।148।।
- घ. बहुभिः स्वयम्। 2. घ. तेभ्योऽपि। 3. घ. परिपूरयेत्।
(120) अगस्त्य-संहिता ———————————————————————————————————————————————— इस प्रकार मन्त्र प्राप्त कर वह विप्र होकर धन्य हो जाता है, इसमें सन्देह नहीं। इसके बाद वह गुरु की आज्ञा से सायं, प्रातः और मध्याह्न में सन्ध्या कर श्रीराम का ध्यान कर मन्त्र का जप करें। जलमस्त्रेण संशोध्य कवचेनावगुण्ठ्य च। चक्रीकृत्य जलं सम्यक् दर्भमूलेन मन्त्रवित्।।49।। आवाहनादिमुद्राभिस्तीर्थमावाह्य पूजयेत्। ब्रह्माण्डोदरतीर्थानि करैः स्पृष्टानि ते रखे।।50।। तेन सत्येन मे देव तीर्थं देहि दिवाकर। गंगे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।।51।। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु। जल को अस्त्र-मन्त्र से शोधित कर कवच मन्त्र से उसे ढँककर चक्रीकरण कर कुश की जड़ से आवाहन आदि की मुद्राओं से तीर्थ का आवाहन कर साधक तीर्थों की पूजा इस मन्त्र से करें- हे देव सूर्य! "सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के गर्भ में जो तीर्थ हैं, जिन्हें सूर्य के किरण स्पर्श करते हैं, इस शपथ के कारण वे तीर्थ मुझे दें। हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु, कावेरी इस जल में आप सब निवास करें।" एवमावाह्य चाराध्य विधिवत् तज्जलं मुने।।52।। आदायाञ्जलिना सम्यक् जपेन्मालामनुं सकृत्। जलं दक्षिणहस्तस्थं सव्यहस्ते विनिक्षिपेत्।।53।। तन्निःसृताम्बुना मूर्ध्नि सिञ्चेन्मालामनुं स्मरन्। दशाक्षरेण तच्छेषमभिमन्त्र्य जलं क्षिपेत्।।54।। इस प्रकार तीर्थों का आवाहन कर उनकी आराधना विधिपूर्वक करके उस जल को अंजलि में लेकर माला-मन्त्र का एक बार जप करें। तब दाहिने हाथ के जल को बाये हाथ में लें तब माला-मन्त्र का जप करते हुए बायें हाथ से गिरते हुए जल को मस्तक पर छिड़के। अन्त में दशाक्षर मन्त्र से शेष जल को चारो ओर छिड़क दें। पुनरञ्जलिमादाय जलं मूर्ध्नि तु तत् क्षिपेत्।¹ ततो रामोऽहमस्मीति गायत्रीं नियतो जपेत्।।55।। फिर अंजलि से जल लेकर उसे अपने मस्तक पर छिड़कें। तब 'मैं राम हूँ' यह भावना कर नियमपूर्वक राम-गायत्री का जप करें।
- घ. जलमूर्ध्वं त्रिरुत्क्षिपेत्। इसके बाद क. में 'मण्डलस्थाय रामाय पाद्यार्घ्यं कल्पयाम्यहम्' यह अधिक है, जो अप्रासंगिक है।
अष्टादशोऽध्यायः (121)
जन्मप्रभृति यत्पापं दशभिर्याति सञ्चितम्। पुराकृतं शतेनैव सहस्रेण जपेन वा।।56।। पूर्वकाल में जन्मकाल से लेकर दश इन्द्रियों द्वारा जो पहले किये गये पाप संचित हैं, वे सौ बार या हजार बार जप से नष्ट हो जाते हैं। पदं² दशरथायेति विद्महेति पदं ततः। सीतापंद समुद्धृत्य वल्लभाय ततो वदेत्।।57।। धीमहीत्यपि तन्नोऽथ रामश्चापि प्रचोदयात्। एषा स्याद् रामगायत्री भक्तानां भुक्तिमुक्तिदा।।58।। सबसे पहले 'दशरथाय' यह पद बोलें। तब 'विद्महे' बोले तब 'सीता' पद कहकर तब 'वल्लभाय' कहें। 'धीमहि' ऐसा कहकर 'तन्नो' 'रामः' और 'प्रचोदयात्' कहें। यह रामगायत्री है, जो भक्तों को भोग और मोक्ष प्रदान करती है। पुरश्चरणमस्याश्च चतुर्लक्षजपावधि। यच्च यावच्च पूजादि सर्वं पूर्ववदाचरेत्।।59।। इसका भी पुरश्चरण चार लाख जप का होता है। जो पूजा होगी, वह पूर्वोक्त विधि से करें। ओमादिरेषा गायत्री मुक्तिमेव प्रयच्छति। मायादिरपि वैदुष्यं रमादिश्च श्रियं मुने।।60।। मदनेनापि संयुक्ता सम्मोहयति मेदिनीम्।। अनयाराधितो रामः सर्वाभीष्टं प्रयच्छति।।61।। इसके आदि में ॐ लगाकर जप करने से मुक्ति ही मिलती है। माया बीज (ह्रीं) आदि में लगाने से वैदुष्य तथा लक्ष्मी बीज (श्रीं) से धन प्राप्ति होती है। कामबीज (क्लीं) लगाकर जप करने से वह पूरी पृथ्वी को सम्मोहित कर लेता है। इस प्रकार पूजित श्रीराम सभी मनोरथ पूर्ण करते हैं। तर्पयेच्च ततो मूलमन्त्रोच्चारणपूर्वकम्। ²रामं तर्पयामि नमः पीठदेवादिपूर्वकम्।।62।। चत्वारिंशद्धरीनादौ सीतादींश्चतुरः क्रमात्। इसके बाद मूलमन्त्र का उच्चारण करते हुए 'रामं तर्पयामि नम' ऐसा कहते हुए पीठस्थ अन्य देवों का भी इसी प्रकार तर्पण करें। पहले चालीस देवताओं का तर्पण (हनूमान्, सुग्रीव, भरत, विभीषण, लक्ष्मण, अंगद, शत्रुघ्न,
- घ. वदेद्। 2. घ. यहाँ दो श्लोक अनुपलब्ध हैं। Rarest Archiver
(122) अगस्त्य-संहिता
जाम्बवान्, धृष्टि, जयन्त, विजय, सुराष्ट्र, राष्ट्रवर्द्धन, अकोप, धर्मपाल और सुमन्त। नल, नील, गवय, गवाक्ष, गन्धमादन, सुरभि, मैन्द और द्विविद। वसिष्ठ, वामदेव, जाबालि, गौतम, भरद्वाज, कौशिक, वाल्मीकि और नारद। दशरथ, कौशल्या, कैकेयी, सुमित्रा। राम लक्ष्मण, भरत एवं शत्रुघ्न।) कर सीता आदि चार (सीता, माण्डवी, उर्मिला एवं श्रुतिकीर्ति) देवों का क्रमिक तर्पण करें। हृदादींस्तर्पयेत्पश्चान्मध्ये मध्ये रघूद्वहम्। नाममन्त्रैर्भविदेवं चत्वारिंशच्छतद्वयम् ॥६३॥ कृत्वैवं प्रत्यहं सम्यक् त्रिसन्ध्यन्तु यथाविधि। स्तुवंश्च प्रणमेद् रामं यथाशक्ति मुनीश्वर। कृतकृत्यो भवेन्मन्त्री सत्यं सत्यं न चान्यथा॥६४॥ हे मुनिश्रेष्ठ सुतीक्ष्ण! हृत् आदि को तर्पण बाद में करें; बीच-बीच में श्रीराम को तर्पण करें। इस प्रकार नाम मन्त्रों से यह तर्पण दो सौ चालीस बार होगा। इस प्रकार सम्यक् रीति से प्रतिदिन तीनों सन्ध्याओं में विधानपूर्वक कृत्य सम्पन्न कर तथा श्रीराम की स्तुति करते हुए, उन्हें यथाशक्ति प्रणाम करें। इस प्रकार साधक कृतकृत्य हो जाता है, यह सत्य है, सत्य है इसमें सन्देह नहीं। इत्यगस्त्यसंहितायां परमरहस्ये पूजाविधानं नाम सप्तदशोऽध्यायः। अथ अष्टादशोऽध्यायः अगस्त्य उवाच अथ पूजाविधानानां लक्षणान्यभिदध्महे। अम्बुचन्दनपुष्पाणि धूपदीपनिवेदनम्¹ ॥१॥ हरेरेतानि² मुख्यानि साधनानि मुनीश्वर। स्थलमप्यर्घ्यपात्राणि शङ्खं चैषाञ्च लक्षणम् ॥२॥ अगस्त्य बोले- हे मुनिश्रेष्ठ सुतीक्ष्ण, अब मैं पूजा-सामग्रियों के स्वरूप बतलाता हूँ। जल, चन्दन, फूल, धूप एवं दीप का समर्पण पूजा के मुख्य साधन हैं तथा पूजा-स्थल, अर्ध्यादिपात्र तथा शंख ये जो साधन हैं, उनका लक्षण मैं कहता हूँ।
- घ. धूपदीपौ निवेदयेत्। 2. क. हविरेतानि।
अष्टादशोऽध्यायः (123) अन्यानिवेदितं शुद्धं प्रकृतिस्थं सुशीतलम्। हेमादिकलशान्तस्थं पूजासाधनमिष्यते।।3।। जो जल दूसरे देवता को न चढाया गया हो तथा कलश में रखा गया हो ऐसा शुद्ध अपने स्वभाव के अनुरूप हो तथा शीतल हो वैसा जल पूजा की सामग्री है। अनन्यार्पितपूर्वाणि गन्धवन्ति सितानि च। पीतान्यपि मनोज्ञानि छिद्रेण रहितानि च।।4।। पुष्पाण्येवात्र शस्यन्ते न चेत् सर्वं निरर्थकम्। जो पुष्प पूर्व में दूसरे देवता को न चढ़ा हो, पवित्र, सुगन्धित, श्वेत अथवा पीत, सुन्दर, छिद्र से रहित हो वे ही फूल इस पूजन में प्रशस्त हैं, नहीं तो सारा व्यर्थ है। चन्दनं मलयोत्पन्नमनाघ्रातं सुशीतलम्।।5।। मलय पर्वत से उत्पन्न श्रीखण्ड चन्दन, जो सूँघा गया न हो और शीतल हो, प्रशस्त है। कर्पूरागरुकस्तूरीहिमान्यादिसुवासितम्¹ । पूजायां शस्यते धूपस्ताम्रकांस्यादिनिर्मिते।।6।। पात्रे वा द्विद्ले भुग्ननाले पद्माकृतौ मुने। सारांगारविनिक्षिप्ते गुग्गुल्वगुरुवृक्षजे।।7।। निर्यासादुत्थितैर्धूपैर्गन्धद्रव्यैस्तथोद्गतैः । अनन्यार्पितगन्धोऽयं शस्यतेऽर्चनकर्मणि।।8।। कर्पूर, अगरु, कस्तूरी, हिमानी आदि से सुगन्धित किया हुआ धूप पूजा में प्रशस्त है। ताँबा, कांसा आदि से निर्मित कमल की आकृति वाला, जिसमें दो नाल लगे हों और दो पत्र भी हों, इस प्रकार के पात्र में सारिल लकड़ी का अंगार डाला गया हो, गुग्गुल या अगुरु के वृक्ष से उत्पन्न निर्यास से उठते हुए धूपों या सुगन्धित द्रव्यों से भी बना जो धूप दूसरे देवता को अर्पित नहीं किया गया हो, वह अर्चना के कर्म में प्रशस्त है। दीपोऽपि पूर्ववत्पात्रे मण्डलाकारनिर्मितः²। प्रतिपात्रं प्रदीप्तश्च वर्त्या गव्यघृतादिना।।9।।
- घ. हिमाभादिसुभाषितम्। 2. घ. मण्डलाकारकारितैः।
(124) अगस्त्य-संहिता
अन्यावेदितः पूजाकर्मण्येव प्रशस्यते। दीप भी पूर्वोक्त स्वरूप के पात्र में गोलाकार में निर्मित और प्रत्येक दीप गाय के घी से जलते हुए दीप पूजा कर्म में प्रशस्त होते हैं, यदि वह दूसरे देवता को समर्पित न किया गया हो। पायसापूपसंपक्वफलोपेतं हविर्मुने¹।।10।। शुद्धं च षड्रसोपेतं अनन्यार्पितमिष्यते। नैवेद्यमर्चनायान्तु सताम्बूलं निवेदयेत्।।11।। खीर, पुआ, पकवान, फल जो शुद्ध हो और छह रसों से परिपूर्ण हो और दूसरे देवता को अर्पित न किया गया हो, वह नैवेद्य पान के साथ पूजा में अर्पित करना चाहिए। स्थलं प्रासादविपिननदीतीरगतं³ समम्। चतुरस्रं चतुर्हस्तं हस्तोन्नतसुवेदिकम्।।12।। चन्द्रातपपताकादितोरणैः प्रोल्लसच्छविः। विविक्तं च विशेषेण शस्यतेऽर्चनकर्मणि।।13।। पूजा-स्थल के रूप में मकान, जंगल, नदी का तट जो समतल, चौकोर, चार हाथ लम्बाई-चौड़ाई वाला, एक हाथ ऊँची वेदी से युक्त, चँदोवा, पताका, बंदनवार आदि से शोभित एकान्त स्थल पूजा-कर्म में प्रशस्त है। ³पात्राणि ताम्रहेमादिनिर्मितानि जलान्तरे। जलजानीव निर्मल्य पाद्याद्यर्हणादिषु।।14।। उपचाराणि शुद्धानि शस्यतेऽत्र विशेषतः। पाद्य, अर्घ्य आदि कार्यों के लिए ताँबा, सोना आदि का पात्र जो जल में कमल के समान स्वच्छ हो प्रशस्त होते हैं। पूजन-कर्म में सभी शुद्ध साधन प्रशस्त होते हैं। शङ्खो नाम सदावर्तः पृष्ठमध्यसुनालकः।।15।। सितैश्च पूरितो नीरैः शस्यतेऽर्चनकर्मणि। सदावर्त नाम का शंख जिसकी पीठ और मध्य भाग में नाल का चिह्न हो वह शुभ्र जल से पूर्ण पूजा-कर्म में प्रशस्त है। एतान्यन्यानि पूजायां साधनानि बहूनि च।।16।।
- घ. पायसं पूपमन्नं च सघृतं सह शर्करम्। 2. घ. नदीतटगतं। 3. घ. यहाँ से छह चरण अनुपलब्ध हैं। Rarest Archiver
अष्टादशोऽध्यायः (125) तान्युत्तमानि मध्यानि न्यूनानि विधिमन्ति वै। स्वस्थः समर्थः कुर्वीत चोत्तमैरेव साधनैः।।17।। मध्यमो मध्यमेनैव न्यूनो न्यूनैस्तपोधन। आपन्नश्चेत् समर्थोऽपि न्यूनैरेव समाचरेत्।।18।। पूजाकर्मविशेषेण देशकालानुसारतः। यथाशक्ति यथान्यायं यथा लोकाविगर्हितम्।।19।। ऊपर कहे गये अथवा अन्य भी बहुत प्रकार के साधन पूजा में होते हैं, वे उत्तम, मध्यम और न्यून प्रकार के होते हैं। जो साधक स्वस्थ हो, समर्थ हो वे उत्तम साधन से पूजा करें। मध्यम कोटि के साधक मध्यम प्रकार के साधन से पूजा करें तथा न्यून साधक न्यून साधनों से करें। समर्थ भी यदि किसी विपत्ति में हो तो न्यून साधनों से ही पूजा करें। पूजा-कर्म के वैशिष्ट्य से देश एवं काल के अनुसार शक्ति तथा औचित्य के अनुसार ऐसे साधनों का व्यवहार करें, जिसे लोक में निन्दित नहीं माना जाता हो। एकेन वान्यत्संकल्पः कुर्यादिवार्चनं तथा।¹ मुद्राश्च² दर्शयेद्यत्नाद् देवसान्निध्यकारिणः।।20।। दर्शितास्तास्तु देवानां मोदकाः द्रावकाः³ मुने। दर्शनीयाः सुतीक्ष्णातो देवतायागकर्मणि।।21।। अथवा एक ही व्यक्ति दोनों कार्य अर्थात् संकल्प और पूजा करें। देवता के साथ नजदीकी साधनेवाली मुद्राएँ यत्नपूर्वक दिखाएँ। दिखाई गयी मुद्राएँ देवताओ को प्रसन्न तथा द्रवित करतीं हैं। हे सुतीक्ष्ण! अतः देवताओं के याग कर्म में मुद्राएँ दिखानी चाहिए। आवाहनी स्थापनी च सन्निधीकरणी तथा। सुसंनिरोधनी मुद्रा संमुखीकरणी तथा।।22।। सकलीकरणी चैव महामुद्रा तथैव च। शङ्खचक्रगदापद्मधेनुकौस्तुभगारुडीम्⁴ ।।23।। श्रीवत्सवनमाले च योनिमुद्रां⁵ च दर्शयेत्। मूलाधाराद् द्वादशान्तामानीतां कुसुमाञ्जलिः।।24।।
- घ. कुर्याद् देवार्चनं हरेः। 2. घ. सुमुद्राः। 3. घ. मोदकास्तारकाः। 4. घ. ºगारुडाः। 5. श्रीवत्सवनमालाख्ययोनिमुद्राश्च।
(126) अगस्त्य-संहिता
आवाहनी, स्थापनी, सन्निधीकरणी संरोधिनी, संमुखीकरणी, सकलीकरणी, महामुद्रा, शंखमुद्रा, चक्रमुद्रा, गदामुद्रा, पद्ममुद्रा, धेनुमुद्रा, कौस्तुभमुद्रा, गरुड़मुद्रा, श्रीवत्समुद्रा, वनमालमुद्रा तथा योनिमुद्रा दिखानी चाहिए। मूलाधार से द्वादशार तक लायी गयी कुसुमाञ्जलि मुद्रा भी दिखानी चाहिए। त्रिस्थानगततेजोभिर्विनीता प्रतिमादिषु। आवाहनीयं मुद्रा स्याद् देवार्चनविधौ मुने।।२५।। एषैवाधोमुखी मुद्रा स्थापने शस्यते पुनः। तीनों स्थानों भूः भुवः एवं स्वः में उद्भूत तेज से प्रतिमा में तेज लाने वाली मुद्रा देवार्चन के विधान में आवाहनी कहलाती है। यही अधोमुखी मुद्रा स्थापना में प्रशस्त है। आवाहनी स्थापनी संनिधीकरणी संनिरोधनी उन्नताङ्गुष्ठयोगेन मुष्टीकृतकरद्वयी।।२६।। सन्निधीकरणी नाम मुद्रा देवार्चने विधौ। दोनों हाथों के अंगूठे को ऊपर की ओर खड़ा कर मुट्ठी बाँधकर संनिधिकरणी मुद्रा बनती है, जो देव-पूजन में प्रशस्त है। अङ्गुष्ठगर्भिणी सैव मुद्रा स्यात् संनिरोधनी।।२७।। इसी संनिधीकरणी मुद्रा में यदि अंगूठे मुट्ठी के अंदर दबे हों तो संनिरोधनी मुद्रा कहलाती है। उत्तानमुष्टियुगला¹ सम्मुखीकरणी तथा। अङ्गैरेवाङ्गविन्यासः सकलीकरणी भवेत्²।।२८।। दोनों मुट्ठी को ऊपर की ओर उठाकर सम्मुखीकरणी मुद्रा बनती है तथा शरीर के सभी अंगों से अंगों का न्यास करना सकलीकरणी मुद्रा कहलाती है।
- घ. उत्तानमुष्टियोगेन। 2. घ. तथा।
अष्टादशोऽध्यायः (127) सम्मुखीकरणी सकलीकरणी समापनी अन्योन्याङ्गुष्ठसंलग्ना विस्तारितकरद्वयी। महामुद्रेयमाख्याता न्यूनाधिकसमापनी ॥129॥ दोनों हाथों के अंगूठे को आपस में सटाने और दोनों हाथों को फैलाने से जो महामुद्रा बनती है, वह न्यूनाधिक दोष को समाप्त करनेवाली समापनी मुद्रा कहलाती है। कनिष्ठानामिकामध्यान्तस्थाङ्गुष्ठेतरागतः । गोपिताङ्गुष्ठमूलेन सन्नतान्मुकुलीकृता ॥130॥ करद्वयेन मुद्रा स्याच्छङ्खाख्येयं सुरार्चने। (दाहिने हाथ की) कनिष्ठा अनामिका मध्यमा के बीच में बायें हाथ का अंगूठा रखकर उसे दाहिने हाथ के अंगूठे की जड़ से ढँकें और अन्य अंगुलियों को चारों ओर से फूल की कली तरह बनावें। दोनों हाथों से बनी यह शंखमुद्रा देवार्चन के लिए कहलाती है। शंखमुद्रा चक्रमुद्रा गदामुद्रा अन्योन्याभिमुखस्पृष्टव्यत्ययेन¹ तु वेष्टयेत् ॥131॥ अङ्गुलीभिः प्रयत्नेन मण्डलीकरणं मुने। चक्रमुद्रेयमाख्याता
- घ. अन्योन्याभिमुखं स्पर्शव्यत्ययेन।
(128) अगस्त्य-संहिता
हे मुने! दोनों हाथों की अंगुलियों को एक दूसरे के विपरीत कर चारों ओर से प्रयत्नपूर्वक अंगुलियों से घेर लें। यह चक्रमुद्रा कहलाती है। गदामुद्रा ततः परम् ।।32।। अन्योन्याभिमुखाश्लिष्टाङ्गुलिः प्रोन्नतमध्यमा । इसके वाद गदा मुद्रा कही जाती है। दसो अंगुलियों को एक दूसरे के सम्मुख गूंथ कर मध्यमा को ऊपर उठावें। अथाङ्गुष्ठद्वयं मध्ये दत्वापि परितः करौ ।।33।। मण्डलीकरणी सम्यगङ्गुलीनां तपोधन । पद्ममुद्रा भवेदेषा हे तपोधन सुतीक्ष्ण! बीच में दोनों हाथों के अंगूठे को सटाकर इसके चारों ओर दोनों हाथों की शेष आठ अंगुलियों से मण्डल बनावें। यह पद्ममुद्रा कहलाती है। पद्ममुद्रा धेनुमुद्रा धेनुमुद्रा ततः परा ।।34।। अनामिकाकनिष्ठाभ्यां तर्जनीभ्यां च मध्यमे। अन्योन्याभिमुखाश्लिष्टे दोनों हाथों की अंगुलियों को एक दूसरे से गूँथकर अनामिका से कनिष्ठिका, कनिष्ठिका से अनामिका तथा तर्जनी से मध्यमा और मध्यमा से तर्जनी को सटा देने पर धेनुमुद्रा या सुरभि मुद्रा बनती है। ततः कौस्तुभसंज्ञिका ।।35।। कनिष्ठेन्योन्यसंलग्नेऽभिमुखे च परस्परम्। वामस्य तर्जनीमध्ये मध्यानामिकयोरपि । वामानामिकसंस्पृष्टे तर्जनीमध्यशोभिता। पययिण नताङ्गुष्ठाद्वयी कौस्तुभलक्षणा ।।37।।
अष्टादशोऽध्यायः (129) इसके बाद कौस्तुभ मुद्रा कही गयी है। दोनों कनिष्ठा को आमने-सामने एक दूसरे से सटाकर वाम हाथ के तर्जनी, मध्यमा और अनामिका के बीच बायीं अनामिका को छूती हुई तर्जनियों के बीच रखकर बारी-बारी से दोनों अंगूठा को नीचे झुकाकर कौस्तुभ मुद्रा बनती है। कनिष्ठान्योन्यसंलग्ना विपरीतं नियोजिता। अधस्तात् प्रापिताङ्गुष्ठा मुद्रा गरुडसंज्ञका।।३८।। कनिष्ठा अंगुलियों को एक दूसरे के विपरीत संलग्न कर उन्हें अंगूठे के नीचे रखने से गरुड़मुद्रा बनती है। वनमाला मुद्रा योनिमुद्रा तर्जन्यङ्गुष्ठमध्यस्था मध्यमानामिकाद्वयी। कनिष्ठानामिकामध्ये तर्जन्यग्रकरद्वयी।।३९।। मुने श्रीवत्समुद्रेयं तर्जनी, अंगूठा, मध्यमा और अनामिका को सटाकर तर्जनी को कनिष्ठा और अनामिका के बीच रखने से श्रीवत्समुद्रा बनती है। वनमाला भवेत् ततः। कनिष्ठानामिकामध्या मुष्टिरुन्नीततर्जनी।।४०।। परिभ्रान्ता शिरस्युच्चैस्तर्जनीभ्यां दिवौकसः। इसके बाद वनमाला होती है। कनिष्ठा, अनामिका के बीच तर्जनी रखकर दोनों हाथों से मुट्ठी बाँधकर दोनों तर्जनी से देवता के हृदय का स्पर्श कर पश्चात् देवता के मस्तक पर तर्जनी को उठाकर घुमावें। Rarest Archiver
(130) अगस्त्य-संहिता मुद्रा योनिसमाख्याता स्यात् करद्वयदर्शिता ।।41।। तर्जन्याकृष्टमध्यान्ता स्थितानामिकयुग्मका। मध्यमूलस्थिताङ्गुष्ठा ज्ञेया शस्तार्चने मुने।।42।। योनि नामक मुद्रा दोनों हाथों से दिखायी जाती है। दोनों मध्यमाओं के नीचे से बायीं तर्जनी के ऊपर दाहिनी अनामिका और दाहिनी तर्जनी के ऊपर बायीं अनामिका रखकर दोनों तर्जनियों से बाँधकर दोनों मध्यमाओं को ऊपर रखने से यह मुद्रा बनती है, जो देवताओं की अर्चना में प्रशस्त है। एताभिर्दशमुद्राभिः पूर्वोक्ताभिश्च सप्तभिः। यो रामर्चयेन्नित्यं मोदयेत् स सुरेश्वरम् ।।43।। द्रावयेदपि¹ विप्रेन्द्र ततः प्रार्थितमाप्नुयात्। पूर्व में कही गयी सात तथा यहाँ कही गयी दश मुद्राओं से जो नित्य श्रीराम की अर्चना करते हैं, वे देवों के ईश्वर विष्णु को प्रसन्न करते हैं, उन्हें द्रवित भी करते हैं और प्रार्थना की गयी वस्तु प्राप्त करते हैं। लक्षण्यान्यासनानां हि वक्ष्यामि मुनिसत्तम ।।44।। तानि स्वस्तिकभद्राब्जवीरादीनि भवन्ति वै। हे मुनिश्रेष्ठ! अब मैं आसनों का लक्षण कहता हूँ। आसन स्वस्तिक, भद्रासन, पद्मासन, वीरासन आदि अनेक प्रकार के होते हैं। कृत्वोत्तानौ क्षितौ पादौ तत्रैवोरुद्वयं समम् ।।45।। निधाय निश्चलं ह्येतत् स्वस्तिकं कीर्त्यते मुने। दोनों पैरों को पृथ्वी पर अपने सामने फैलाकर दोनों जंघाओं को समान कर अविचल होकर बैठें। यह स्वस्तिक मुद्रा कहलाती है। ( प्रयोग में बायें पैर को दायीं जंघा की मांसपेशियों के बीच तथा दायें पैर को बांयी जंघा के बीच फंसाकर स्थिर होकर बैठने से यह आसन बनता है। पादद्वयं समं जानुद्वयोरपि तु कारितम् ।।46।। भद्रासनमिदं श्रेष्ठं जपेत् तत्तत् फलप्रदम्। दोनों पैरों को समान रूप से दोनों घुटना के ऊपर करने से वज्रासन कहलाता है। इस श्रेष्ठ आसन में जो जप किये जाते हैं वे फलदायी होते हैं।
- आचार्य रामकिशोर कृत 'मुद्राप्रकाश' नामक ग्रन्थ में 'मोदयन्ति द्रावयन्ति देवान् इति मुद्राः' यह परिभाषा दी गयी है।
अष्टादशोऽध्यायः (131) पादद्वयं समं ⁃ सम्यगूरुमूलद्वयोपरि ।।47।। कृतं पद्मासनं ह्येतच्छ्रेष्ठं सर्वेषु कर्मसु। दोनों पैरों को भली भाँति जंघा की जड़ के ऊपर रखकर किया गया पद्मासन सभी कर्मों में श्रेष्ठ है। वामपादे निधायाङ्कं मूलं पादं च दक्षिणम्। वामाङ्गाग्रे दृतिर्ह्येतद्¹ वीरासनमुदीरितम् ।।48।। बाँये पैर को जमीन पर टिकाकर घुटना पर बाँयी केहुनी को टिका लें। तथा बायें पैर को मोड़कर भूमि पर रखें। इस स्थिति में वाँयीं ओर दृष्टि केन्द्रित करने पर वह वीरासन कहलाता है। योगासनं चमूष्काधः पाणिं दत्वा पदान्तरम्। जङ्घाद्वयोर्निधायैतद्योगेभीष्टं प्रयच्छति ।।49।। (यहाँ भी पाठ सन्देहास्पद है। अन्यत्र विवरण के अनुसार पद्मासन में बैठकर दोनों ऐँड़ियों को पेट से दबाकर दोनों जंघाओं को एक समान रखकर आगे की ओर कपाल को भूमि से सटाने पर योगासन होता है।) वामाङ्कपाश्र्वे पाणिञ्च दक्षिणं चेतरं पुनः। पाष्ण्र्यन्तरं विधायैवं कुर्याज्जानुद्वयं समम् ।।50।। गोमूत्रासनमेतत् स्यात् सर्वाघौघविनाशनम्। बायीं काँख के को बायीं ऐंड़ी पर तथा दायें काँख को दायीं एड़ी पर टिकाकर दोनों जंघाओं को समानान्तर कर लें। यह गोमूत्रासन कहलाता है, जिससे सभी पाप विनष्ट हो जाते हैं। आसनानि बहूनि स्युरेवमेव जपादिषु ।।51।। येन केनासनेनैव वीरः स्थित्वा जपादिकम्।¹ इस प्रकार जप आदि में अनेक आसन है। किसी भी एक आसन में वीर की तरह निर्वाह करते हुए जप आदि करें। कुर्वीत भक्तियुक्तस्तु भावयेत् पुरुषोत्तमम्।। एवं यः कुरुते पूजाजपहोमादिकं मुने ।।52।। सर्वेषामिह पूज्योऽयमिह लोके परत्र च।
- क. में अनुपलब्ध।
(132) अगस्त्य-संहिता भक्तिभाव के साथ उपर्युक्त कर्म करें और पुरुषोत्तम की भावना करें। जो इस प्रकार पूजा, जप, होम आदि करते हैं, वे इस संसार में और परलोक में सबके द्वारा पूजित होते हैं। पूजा जपश्च होमश्च मन्त्राणामुद्धृतिस्तथा।।53।। दीक्षाभिषेकमार्गस्तु दर्शितोऽत्र तपोनिधे। पूजोपकरणादीनां लक्षणान्यपि सुव्रत।।54।। दर्शितानि प्रयत्नेन सर्वं भक्त्यावधारय। सुतीक्ष्णाभिहितं यत्नाद् यदेतद्¹ भुक्तिमुक्तिदम् ।।55।। नावैष्णवेभ्यो वक्तव्यं न श्राव्यमिति मे मतिः। यत्नेन विष्णुभक्ताय चार्हते² देयमित्यपि।।56।। पूजा, जप, होम, मन्त्रों की आहुति तथा दीक्षा और अभिषेक का मार्ग मैंने मूल रूप से बतला दिया। पूजा में प्रयुक्त होनेवाले उपकरणों के लक्षण भी प्रयत्नपूर्वक मैंने बलता दिया, उन सबको भक्तिभाव से समझो। हे सुतीक्ष्ण! मैंने जो पूजा की विधि तुम्हें बतलायी, उसे किसी वैष्णव से भिन्न व्यक्ति के सामने मत बोलना, न उन्हें सुनाना, यह मेरा मत है। विष्णु के भक्त जो इस विधि को ग्रहण करने में समर्थ हों, उन्हें यत्नपूर्वक देना चाहिए, यह भी मेरा मत है। इत्यगस्त्यसंहितायां परमरहस्ये आसनमुद्राप्रदर्शनं नामाष्टादशोऽध्यायः। अथ एकोनविंशोऽध्यायः अगस्तिरुवाच सुतीक्ष्ण मन्त्रवर्येषु श्रेष्ठो वैष्णव उच्यते। गाणपत्येषु शैवेषु शाक्तसौरेष्वभीष्टदः।।1।। वैष्णवेष्वपि सर्वेषु राममन्त्रः फलाधिकः। गाणपत्यादिमन्त्रेषु कोटिकोटिगुणाधिकः।।2।। अगस्त्य बोले- हे सुतीक्ष्ण! गाणपत्य, शैव, शाक्त, सौर मन्त्रों में भी वैष्णव मन्त्र श्रेष्ठ है तथा मनोरथ सिद्ध करनेवाला है। वैष्णव-मन्त्रों में भी राममन्त्र गाणपत्य आदि मन्त्रों में करोड़ों गुना अधिक फल देनेवाला है।
- घ. यद्वद्वैष्णवं। 2. क. चार्थिने। 3. घ. ⁰कामदोऽयं।
एकोनविंशोऽध्यायः (133) मन्त्रेषु तेष्वप्यनायासफलदोऽयं³ षडक्षरः। षडक्षरोऽयं मन्त्रस्तु सर्वाघौघनिवारणः।।३।। राममन्त्र भी अनेक हैं; किन्तु उनमें भी अनायास फल देनेवाला यह छह अक्षरों का मन्त्र है। यह छह अक्षरों का मन्त्र सभी पापों का नाश करनेवाला है। मन्त्रराज इति प्रोक्तः सर्वेषामुत्तमोत्तमः। दैनन्दिनं च दुरितं पक्षमासर्तुवर्षजम्।।४।। इसे मन्त्रराज कहा गया है जो सभी मन्त्रों में उत्तम है। पक्ष, मास, ऋतु और वर्ष में किये गये पापों को नाश करने के साथ प्रतिदिन किये गये पाप को भी नाश करता है। सर्वं दहति निःशेषं ऊर्णाजालमिवानलः।¹ ब्रह्महत्यासहस्राणि ज्ञानाज्ञानकृतानि च।।५।। जैसे आग ऊन से बने जाल को निःशेष कर जला देता है, उसी प्रकार यह मन्त्र हजारो ब्रह्महत्या और ज्ञानवश या अज्ञानवश जो पाप किये गये हैं उन्हें जला देता है। स्वर्णस्तेयसुरापानं गुरुतल्पायुतानि च।।६।। कोटिकोटिसहस्राणि ह्युपपातकान्यपि। सर्वाण्यपि शमं यान्ति² राममन्त्रानुकीर्तनात्।।७।। सोने की चोरी, मद्यपान, गुरु की शय्या पर शयन आदि जो करोड़ों करोड़ों महापाप हैं और अनेक उपपातक भी हैं, वे सब श्रीराम के मन्त्र के जप से शान्त हो जाते हैं। भूतप्रेतपिशाचाद्याः कूष्माण्डाः ग्रहराक्षसाः। दूरादेव पलायन्ते³ राममन्त्रप्रभावतः⁴।।८।। भूत, प्रेत, पिशाच, कूष्माण्ड, ग्रह, राक्षस श्रीराम के मन्त्र के प्रभाव से दूर भाग जाते हैं। मालिन्यमपि सांकार्यं यच्च यावच्च दूषितम्। सर्वं विलयमाप्नोति राममन्त्रे तु कीर्तिते।।९।।
- घ. तूर्णाचलमिवानलः। 2. घ. विनश्यन्ति। 3. क. प्रधावन्ति। 4. राममन्त्रप्रसादतः। ५ शामिताः।
(134) अगस्त्य-संहिता मलिनता, संकरता और जो जितने दोष हैं, सब श्रीराम का मन्त्र जपने से विलुप्त हो जाते हैं। आब्रह्मबीजदोषाश्च नियमातिक्रमोद्भवाः। स्त्रीणाञ्च पुरुषाणां स्युर्मन्त्रेणानेन नाशिताः⁵।।१०।। ब्रह्म से लेकर उत्पत्ति के बीज पर्यन्त जो दोष होते हैं या नियम का त्याग करने से स्त्रियों और पुरुषों में जो दोष उत्पन्न होते हैं, वे सब इस मन्त्र से नष्ट हो जाते हैं। येषु येष्वेष्वपि देशेषु रामः परमुपास्यते।।११।। दुर्भिक्षादिभयान्येषु न भवन्ति कदाचन। जिन जिन देशों में श्रीराम परम देवता के रूप में पूजित होते हैं, वहाँ दुर्भिक्ष आदि का भय कभी नहीं रहता। शान्तः प्रसन्नो वरदोऽक्रोधनो भक्तवत्सलः।।१२।। अनेन सदृशो मन्त्रो जगत्स्वपि न विद्यते।¹ संसार में इस मन्त्र के समान शान्त, प्रसन्न, वर देनेवाला, सौम्य तथा भक्तों के प्रति संतान का भाव रखनेवाला मन्त्र नहीं है। अनेनाराधितो रामः प्रसीदत्येव सत्वरम्।।१३।। प्रददात्यायुरैश्वर्यं² सम्मानोत्तमतामपि। इस मन्त्र से पूजित श्रीराम शीघ्र ही प्रसन्न होते हैं और आयु, ऐश्वर्य, सम्मान तथा श्रेष्ठता प्रदान करते हैं। य एवमुक्तमार्गेण मन्त्राराधनतत्परः।।१४।। सकामो भुक्तिमाप्नोति निष्कामो मुक्तिमेति च। प्राप्नोत्युभयकामस्तु भुक्तिं मुक्तिं न संशयः।।१५।। जो इस प्रकार पूर्वोक्त पद्धति से मन्त्र के आराधन में तत्पर होते हैं, वे सकाम होने पर भोग प्राप्त करते हैं और निष्काम होने पर मुक्त हो जाते हैं और दोनों चाहनेवाले भोग और मोक्ष दोनों प्राप्त करते हैं इसमें सन्देह नहीं। सुतीक्ष्ण उवाच श्रुतिस्मृतिपुराणार्थनिश्चय ज्ञानवित्तम। सन्देहं छिन्धि पृच्छामि तातात्रानुग्रहं कुरु।।१६।।
- घ. में अनुपलब्ध। 2. घ. ददात्यायुष्यमैश्वर्यं।