अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 182, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ेंअष्टादशोऽध्यायः (121)
जन्मप्रभृति यत्पापं दशभिर्याति सञ्चितम्। पुराकृतं शतेनैव सहस्रेण जपेन वा।।56।। पूर्वकाल में जन्मकाल से लेकर दश इन्द्रियों द्वारा जो पहले किये गये पाप संचित हैं, वे सौ बार या हजार बार जप से नष्ट हो जाते हैं। पदं² दशरथायेति विद्महेति पदं ततः। सीतापंद समुद्धृत्य वल्लभाय ततो वदेत्।।57।। धीमहीत्यपि तन्नोऽथ रामश्चापि प्रचोदयात्। एषा स्याद् रामगायत्री भक्तानां भुक्तिमुक्तिदा।।58।। सबसे पहले 'दशरथाय' यह पद बोलें। तब 'विद्महे' बोले तब 'सीता' पद कहकर तब 'वल्लभाय' कहें। 'धीमहि' ऐसा कहकर 'तन्नो' 'रामः' और 'प्रचोदयात्' कहें। यह रामगायत्री है, जो भक्तों को भोग और मोक्ष प्रदान करती है। पुरश्चरणमस्याश्च चतुर्लक्षजपावधि। यच्च यावच्च पूजादि सर्वं पूर्ववदाचरेत्।।59।। इसका भी पुरश्चरण चार लाख जप का होता है। जो पूजा होगी, वह पूर्वोक्त विधि से करें। ओमादिरेषा गायत्री मुक्तिमेव प्रयच्छति। मायादिरपि वैदुष्यं रमादिश्च श्रियं मुने।।60।। मदनेनापि संयुक्ता सम्मोहयति मेदिनीम्।। अनयाराधितो रामः सर्वाभीष्टं प्रयच्छति।।61।। इसके आदि में ॐ लगाकर जप करने से मुक्ति ही मिलती है। माया बीज (ह्रीं) आदि में लगाने से वैदुष्य तथा लक्ष्मी बीज (श्रीं) से धन प्राप्ति होती है। कामबीज (क्लीं) लगाकर जप करने से वह पूरी पृथ्वी को सम्मोहित कर लेता है। इस प्रकार पूजित श्रीराम सभी मनोरथ पूर्ण करते हैं। तर्पयेच्च ततो मूलमन्त्रोच्चारणपूर्वकम्। ²रामं तर्पयामि नमः पीठदेवादिपूर्वकम्।।62।। चत्वारिंशद्धरीनादौ सीतादींश्चतुरः क्रमात्। इसके बाद मूलमन्त्र का उच्चारण करते हुए 'रामं तर्पयामि नम' ऐसा कहते हुए पीठस्थ अन्य देवों का भी इसी प्रकार तर्पण करें। पहले चालीस देवताओं का तर्पण (हनूमान्, सुग्रीव, भरत, विभीषण, लक्ष्मण, अंगद, शत्रुघ्न,
- घ. वदेद्। 2. घ. यहाँ दो श्लोक अनुपलब्ध हैं। Rarest Archiver