भारतकोश
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

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पृष्ठ 181

(120) अगस्त्य-संहिता ———————————————————————————————————————————————— इस प्रकार मन्त्र प्राप्त कर वह विप्र होकर धन्य हो जाता है, इसमें सन्देह नहीं। इसके बाद वह गुरु की आज्ञा से सायं, प्रातः और मध्याह्न में सन्ध्या कर श्रीराम का ध्यान कर मन्त्र का जप करें। जलमस्त्रेण संशोध्य कवचेनावगुण्ठ्य च। चक्रीकृत्य जलं सम्यक् दर्भमूलेन मन्त्रवित्।।49।। आवाहनादिमुद्राभिस्तीर्थमावाह्य पूजयेत्। ब्रह्माण्डोदरतीर्थानि करैः स्पृष्टानि ते रखे।।50।। तेन सत्येन मे देव तीर्थं देहि दिवाकर। गंगे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।।51।। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु। जल को अस्त्र-मन्त्र से शोधित कर कवच मन्त्र से उसे ढँककर चक्रीकरण कर कुश की जड़ से आवाहन आदि की मुद्राओं से तीर्थ का आवाहन कर साधक तीर्थों की पूजा इस मन्त्र से करें- हे देव सूर्य! "सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के गर्भ में जो तीर्थ हैं, जिन्हें सूर्य के किरण स्पर्श करते हैं, इस शपथ के कारण वे तीर्थ मुझे दें। हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु, कावेरी इस जल में आप सब निवास करें।" एवमावाह्य चाराध्य विधिवत् तज्जलं मुने।।52।। आदायाञ्जलिना सम्यक् जपेन्मालामनुं सकृत्। जलं दक्षिणहस्तस्थं सव्यहस्ते विनिक्षिपेत्।।53।। तन्निःसृताम्बुना मूर्ध्नि सिञ्चेन्मालामनुं स्मरन्। दशाक्षरेण तच्छेषमभिमन्त्र्य जलं क्षिपेत्।।54।। इस प्रकार तीर्थों का आवाहन कर उनकी आराधना विधिपूर्वक करके उस जल को अंजलि में लेकर माला-मन्त्र का एक बार जप करें। तब दाहिने हाथ के जल को बाये हाथ में लें तब माला-मन्त्र का जप करते हुए बायें हाथ से गिरते हुए जल को मस्तक पर छिड़के। अन्त में दशाक्षर मन्त्र से शेष जल को चारो ओर छिड़क दें। पुनरञ्जलिमादाय जलं मूर्ध्नि तु तत् क्षिपेत्।¹ ततो रामोऽहमस्मीति गायत्रीं नियतो जपेत्।।55।। फिर अंजलि से जल लेकर उसे अपने मस्तक पर छिड़कें। तब 'मैं राम हूँ' यह भावना कर नियमपूर्वक राम-गायत्री का जप करें।

  1. घ. जलमूर्ध्वं त्रिरुत्क्षिपेत्। इसके बाद क. में 'मण्डलस्थाय रामाय पाद्यार्घ्यं कल्पयाम्यहम्' यह अधिक है, जो अप्रासंगिक है।