अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 195, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ें(134) अगस्त्य-संहिता मलिनता, संकरता और जो जितने दोष हैं, सब श्रीराम का मन्त्र जपने से विलुप्त हो जाते हैं। आब्रह्मबीजदोषाश्च नियमातिक्रमोद्भवाः। स्त्रीणाञ्च पुरुषाणां स्युर्मन्त्रेणानेन नाशिताः⁵।।१०।। ब्रह्म से लेकर उत्पत्ति के बीज पर्यन्त जो दोष होते हैं या नियम का त्याग करने से स्त्रियों और पुरुषों में जो दोष उत्पन्न होते हैं, वे सब इस मन्त्र से नष्ट हो जाते हैं। येषु येष्वेष्वपि देशेषु रामः परमुपास्यते।।११।। दुर्भिक्षादिभयान्येषु न भवन्ति कदाचन। जिन जिन देशों में श्रीराम परम देवता के रूप में पूजित होते हैं, वहाँ दुर्भिक्ष आदि का भय कभी नहीं रहता। शान्तः प्रसन्नो वरदोऽक्रोधनो भक्तवत्सलः।।१२।। अनेन सदृशो मन्त्रो जगत्स्वपि न विद्यते।¹ संसार में इस मन्त्र के समान शान्त, प्रसन्न, वर देनेवाला, सौम्य तथा भक्तों के प्रति संतान का भाव रखनेवाला मन्त्र नहीं है। अनेनाराधितो रामः प्रसीदत्येव सत्वरम्।।१३।। प्रददात्यायुरैश्वर्यं² सम्मानोत्तमतामपि। इस मन्त्र से पूजित श्रीराम शीघ्र ही प्रसन्न होते हैं और आयु, ऐश्वर्य, सम्मान तथा श्रेष्ठता प्रदान करते हैं। य एवमुक्तमार्गेण मन्त्राराधनतत्परः।।१४।। सकामो भुक्तिमाप्नोति निष्कामो मुक्तिमेति च। प्राप्नोत्युभयकामस्तु भुक्तिं मुक्तिं न संशयः।।१५।। जो इस प्रकार पूर्वोक्त पद्धति से मन्त्र के आराधन में तत्पर होते हैं, वे सकाम होने पर भोग प्राप्त करते हैं और निष्काम होने पर मुक्त हो जाते हैं और दोनों चाहनेवाले भोग और मोक्ष दोनों प्राप्त करते हैं इसमें सन्देह नहीं। सुतीक्ष्ण उवाच श्रुतिस्मृतिपुराणार्थनिश्चय ज्ञानवित्तम। सन्देहं छिन्धि पृच्छामि तातात्रानुग्रहं कुरु।।१६।।
- घ. में अनुपलब्ध। 2. घ. ददात्यायुष्यमैश्वर्यं।