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अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

पृष्ठ 194, कुल 337 में से

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पृष्ठ 194

एकोनविंशोऽध्यायः (133) मन्त्रेषु तेष्वप्यनायासफलदोऽयं³ षडक्षरः। षडक्षरोऽयं मन्त्रस्तु सर्वाघौघनिवारणः।।३।। राममन्त्र भी अनेक हैं; किन्तु उनमें भी अनायास फल देनेवाला यह छह अक्षरों का मन्त्र है। यह छह अक्षरों का मन्त्र सभी पापों का नाश करनेवाला है। मन्त्रराज इति प्रोक्तः सर्वेषामुत्तमोत्तमः। दैनन्दिनं च दुरितं पक्षमासर्तुवर्षजम्।।४।। इसे मन्त्रराज कहा गया है जो सभी मन्त्रों में उत्तम है। पक्ष, मास, ऋतु और वर्ष में किये गये पापों को नाश करने के साथ प्रतिदिन किये गये पाप को भी नाश करता है। सर्वं दहति निःशेषं ऊर्णाजालमिवानलः।¹ ब्रह्महत्यासहस्राणि ज्ञानाज्ञानकृतानि च।।५।। जैसे आग ऊन से बने जाल को निःशेष कर जला देता है, उसी प्रकार यह मन्त्र हजारो ब्रह्महत्या और ज्ञानवश या अज्ञानवश जो पाप किये गये हैं उन्हें जला देता है। स्वर्णस्तेयसुरापानं गुरुतल्पायुतानि च।।६।। कोटिकोटिसहस्राणि ह्युपपातकान्यपि। सर्वाण्यपि शमं यान्ति² राममन्त्रानुकीर्तनात्।।७।। सोने की चोरी, मद्यपान, गुरु की शय्या पर शयन आदि जो करोड़ों करोड़ों महापाप हैं और अनेक उपपातक भी हैं, वे सब श्रीराम के मन्त्र के जप से शान्त हो जाते हैं। भूतप्रेतपिशाचाद्याः कूष्माण्डाः ग्रहराक्षसाः। दूरादेव पलायन्ते³ राममन्त्रप्रभावतः⁴।।८।। भूत, प्रेत, पिशाच, कूष्माण्ड, ग्रह, राक्षस श्रीराम के मन्त्र के प्रभाव से दूर भाग जाते हैं। मालिन्यमपि सांकार्यं यच्च यावच्च दूषितम्। सर्वं विलयमाप्नोति राममन्त्रे तु कीर्तिते।।९।।

  1. घ. तूर्णाचलमिवानलः। 2. घ. विनश्यन्ति। 3. क. प्रधावन्ति। 4. राममन्त्रप्रसादतः। ५ शामिताः।
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