अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ
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(126) अगस्त्य-संहिता
आवाहनी, स्थापनी, सन्निधीकरणी संरोधिनी, संमुखीकरणी, सकलीकरणी, महामुद्रा, शंखमुद्रा, चक्रमुद्रा, गदामुद्रा, पद्ममुद्रा, धेनुमुद्रा, कौस्तुभमुद्रा, गरुड़मुद्रा, श्रीवत्समुद्रा, वनमालमुद्रा तथा योनिमुद्रा दिखानी चाहिए। मूलाधार से द्वादशार तक लायी गयी कुसुमाञ्जलि मुद्रा भी दिखानी चाहिए। त्रिस्थानगततेजोभिर्विनीता प्रतिमादिषु। आवाहनीयं मुद्रा स्याद् देवार्चनविधौ मुने।।२५।। एषैवाधोमुखी मुद्रा स्थापने शस्यते पुनः। तीनों स्थानों भूः भुवः एवं स्वः में उद्भूत तेज से प्रतिमा में तेज लाने वाली मुद्रा देवार्चन के विधान में आवाहनी कहलाती है। यही अधोमुखी मुद्रा स्थापना में प्रशस्त है। आवाहनी स्थापनी संनिधीकरणी संनिरोधनी उन्नताङ्गुष्ठयोगेन मुष्टीकृतकरद्वयी।।२६।। सन्निधीकरणी नाम मुद्रा देवार्चने विधौ। दोनों हाथों के अंगूठे को ऊपर की ओर खड़ा कर मुट्ठी बाँधकर संनिधिकरणी मुद्रा बनती है, जो देव-पूजन में प्रशस्त है। अङ्गुष्ठगर्भिणी सैव मुद्रा स्यात् संनिरोधनी।।२७।। इसी संनिधीकरणी मुद्रा में यदि अंगूठे मुट्ठी के अंदर दबे हों तो संनिरोधनी मुद्रा कहलाती है। उत्तानमुष्टियुगला¹ सम्मुखीकरणी तथा। अङ्गैरेवाङ्गविन्यासः सकलीकरणी भवेत्²।।२८।। दोनों मुट्ठी को ऊपर की ओर उठाकर सम्मुखीकरणी मुद्रा बनती है तथा शरीर के सभी अंगों से अंगों का न्यास करना सकलीकरणी मुद्रा कहलाती है।
- घ. उत्तानमुष्टियोगेन। 2. घ. तथा।