अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टादशोऽध्यायः (125) तान्युत्तमानि मध्यानि न्यूनानि विधिमन्ति वै। स्वस्थः समर्थः कुर्वीत चोत्तमैरेव साधनैः।।17।। मध्यमो मध्यमेनैव न्यूनो न्यूनैस्तपोधन। आपन्नश्चेत् समर्थोऽपि न्यूनैरेव समाचरेत्।।18।। पूजाकर्मविशेषेण देशकालानुसारतः। यथाशक्ति यथान्यायं यथा लोकाविगर्हितम्।।19।। ऊपर कहे गये अथवा अन्य भी बहुत प्रकार के साधन पूजा में होते हैं, वे उत्तम, मध्यम और न्यून प्रकार के होते हैं। जो साधक स्वस्थ हो, समर्थ हो वे उत्तम साधन से पूजा करें। मध्यम कोटि के साधक मध्यम प्रकार के साधन से पूजा करें तथा न्यून साधक न्यून साधनों से करें। समर्थ भी यदि किसी विपत्ति में हो तो न्यून साधनों से ही पूजा करें। पूजा-कर्म के वैशिष्ट्य से देश एवं काल के अनुसार शक्ति तथा औचित्य के अनुसार ऐसे साधनों का व्यवहार करें, जिसे लोक में निन्दित नहीं माना जाता हो। एकेन वान्यत्संकल्पः कुर्यादिवार्चनं तथा।¹ मुद्राश्च² दर्शयेद्यत्नाद् देवसान्निध्यकारिणः।।20।। दर्शितास्तास्तु देवानां मोदकाः द्रावकाः³ मुने। दर्शनीयाः सुतीक्ष्णातो देवतायागकर्मणि।।21।। अथवा एक ही व्यक्ति दोनों कार्य अर्थात् संकल्प और पूजा करें। देवता के साथ नजदीकी साधनेवाली मुद्राएँ यत्नपूर्वक दिखाएँ। दिखाई गयी मुद्राएँ देवताओ को प्रसन्न तथा द्रवित करतीं हैं। हे सुतीक्ष्ण! अतः देवताओं के याग कर्म में मुद्राएँ दिखानी चाहिए। आवाहनी स्थापनी च सन्निधीकरणी तथा। सुसंनिरोधनी मुद्रा संमुखीकरणी तथा।।22।। सकलीकरणी चैव महामुद्रा तथैव च। शङ्खचक्रगदापद्मधेनुकौस्तुभगारुडीम्⁴ ।।23।। श्रीवत्सवनमाले च योनिमुद्रां⁵ च दर्शयेत्। मूलाधाराद् द्वादशान्तामानीतां कुसुमाञ्जलिः।।24।।
- घ. कुर्याद् देवार्चनं हरेः। 2. घ. सुमुद्राः। 3. घ. मोदकास्तारकाः। 4. घ. ºगारुडाः। 5. श्रीवत्सवनमालाख्ययोनिमुद्राश्च।