भारतकोश
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

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पृष्ठ 185

(124) अगस्त्य-संहिता

अन्यावेदितः पूजाकर्मण्येव प्रशस्यते। दीप भी पूर्वोक्त स्वरूप के पात्र में गोलाकार में निर्मित और प्रत्येक दीप गाय के घी से जलते हुए दीप पूजा कर्म में प्रशस्त होते हैं, यदि वह दूसरे देवता को समर्पित न किया गया हो। पायसापूपसंपक्वफलोपेतं हविर्मुने¹।।10।। शुद्धं च षड्रसोपेतं अनन्यार्पितमिष्यते। नैवेद्यमर्चनायान्तु सताम्बूलं निवेदयेत्।।11।। खीर, पुआ, पकवान, फल जो शुद्ध हो और छह रसों से परिपूर्ण हो और दूसरे देवता को अर्पित न किया गया हो, वह नैवेद्य पान के साथ पूजा में अर्पित करना चाहिए। स्थलं प्रासादविपिननदीतीरगतं³ समम्। चतुरस्रं चतुर्हस्तं हस्तोन्नतसुवेदिकम्।।12।। चन्द्रातपपताकादितोरणैः प्रोल्लसच्छविः। विविक्तं च विशेषेण शस्यतेऽर्चनकर्मणि।।13।। पूजा-स्थल के रूप में मकान, जंगल, नदी का तट जो समतल, चौकोर, चार हाथ लम्बाई-चौड़ाई वाला, एक हाथ ऊँची वेदी से युक्त, चँदोवा, पताका, बंदनवार आदि से शोभित एकान्त स्थल पूजा-कर्म में प्रशस्त है। ³पात्राणि ताम्रहेमादिनिर्मितानि जलान्तरे। जलजानीव निर्मल्य पाद्याद्यर्हणादिषु।।14।। उपचाराणि शुद्धानि शस्यतेऽत्र विशेषतः। पाद्य, अर्घ्य आदि कार्यों के लिए ताँबा, सोना आदि का पात्र जो जल में कमल के समान स्वच्छ हो प्रशस्त होते हैं। पूजन-कर्म में सभी शुद्ध साधन प्रशस्त होते हैं। शङ्खो नाम सदावर्तः पृष्ठमध्यसुनालकः।।15।। सितैश्च पूरितो नीरैः शस्यतेऽर्चनकर्मणि। सदावर्त नाम का शंख जिसकी पीठ और मध्य भाग में नाल का चिह्न हो वह शुभ्र जल से पूर्ण पूजा-कर्म में प्रशस्त है। एतान्यन्यानि पूजायां साधनानि बहूनि च।।16।।

  1. घ. पायसं पूपमन्नं च सघृतं सह शर्करम्। 2. घ. नदीतटगतं। 3. घ. यहाँ से छह चरण अनुपलब्ध हैं। Rarest Archiver