अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टादशोऽध्यायः (123) अन्यानिवेदितं शुद्धं प्रकृतिस्थं सुशीतलम्। हेमादिकलशान्तस्थं पूजासाधनमिष्यते।।3।। जो जल दूसरे देवता को न चढाया गया हो तथा कलश में रखा गया हो ऐसा शुद्ध अपने स्वभाव के अनुरूप हो तथा शीतल हो वैसा जल पूजा की सामग्री है। अनन्यार्पितपूर्वाणि गन्धवन्ति सितानि च। पीतान्यपि मनोज्ञानि छिद्रेण रहितानि च।।4।। पुष्पाण्येवात्र शस्यन्ते न चेत् सर्वं निरर्थकम्। जो पुष्प पूर्व में दूसरे देवता को न चढ़ा हो, पवित्र, सुगन्धित, श्वेत अथवा पीत, सुन्दर, छिद्र से रहित हो वे ही फूल इस पूजन में प्रशस्त हैं, नहीं तो सारा व्यर्थ है। चन्दनं मलयोत्पन्नमनाघ्रातं सुशीतलम्।।5।। मलय पर्वत से उत्पन्न श्रीखण्ड चन्दन, जो सूँघा गया न हो और शीतल हो, प्रशस्त है। कर्पूरागरुकस्तूरीहिमान्यादिसुवासितम्¹ । पूजायां शस्यते धूपस्ताम्रकांस्यादिनिर्मिते।।6।। पात्रे वा द्विद्ले भुग्ननाले पद्माकृतौ मुने। सारांगारविनिक्षिप्ते गुग्गुल्वगुरुवृक्षजे।।7।। निर्यासादुत्थितैर्धूपैर्गन्धद्रव्यैस्तथोद्गतैः । अनन्यार्पितगन्धोऽयं शस्यतेऽर्चनकर्मणि।।8।। कर्पूर, अगरु, कस्तूरी, हिमानी आदि से सुगन्धित किया हुआ धूप पूजा में प्रशस्त है। ताँबा, कांसा आदि से निर्मित कमल की आकृति वाला, जिसमें दो नाल लगे हों और दो पत्र भी हों, इस प्रकार के पात्र में सारिल लकड़ी का अंगार डाला गया हो, गुग्गुल या अगुरु के वृक्ष से उत्पन्न निर्यास से उठते हुए धूपों या सुगन्धित द्रव्यों से भी बना जो धूप दूसरे देवता को अर्पित नहीं किया गया हो, वह अर्चना के कर्म में प्रशस्त है। दीपोऽपि पूर्ववत्पात्रे मण्डलाकारनिर्मितः²। प्रतिपात्रं प्रदीप्तश्च वर्त्या गव्यघृतादिना।।9।।
- घ. हिमाभादिसुभाषितम्। 2. घ. मण्डलाकारकारितैः।