अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 188, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ेंअष्टादशोऽध्यायः (127) सम्मुखीकरणी सकलीकरणी समापनी अन्योन्याङ्गुष्ठसंलग्ना विस्तारितकरद्वयी। महामुद्रेयमाख्याता न्यूनाधिकसमापनी ॥129॥ दोनों हाथों के अंगूठे को आपस में सटाने और दोनों हाथों को फैलाने से जो महामुद्रा बनती है, वह न्यूनाधिक दोष को समाप्त करनेवाली समापनी मुद्रा कहलाती है। कनिष्ठानामिकामध्यान्तस्थाङ्गुष्ठेतरागतः । गोपिताङ्गुष्ठमूलेन सन्नतान्मुकुलीकृता ॥130॥ करद्वयेन मुद्रा स्याच्छङ्खाख्येयं सुरार्चने। (दाहिने हाथ की) कनिष्ठा अनामिका मध्यमा के बीच में बायें हाथ का अंगूठा रखकर उसे दाहिने हाथ के अंगूठे की जड़ से ढँकें और अन्य अंगुलियों को चारों ओर से फूल की कली तरह बनावें। दोनों हाथों से बनी यह शंखमुद्रा देवार्चन के लिए कहलाती है। शंखमुद्रा चक्रमुद्रा गदामुद्रा अन्योन्याभिमुखस्पृष्टव्यत्ययेन¹ तु वेष्टयेत् ॥131॥ अङ्गुलीभिः प्रयत्नेन मण्डलीकरणं मुने। चक्रमुद्रेयमाख्याता
- घ. अन्योन्याभिमुखं स्पर्शव्यत्ययेन।