अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 189, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ें(128) अगस्त्य-संहिता
हे मुने! दोनों हाथों की अंगुलियों को एक दूसरे के विपरीत कर चारों ओर से प्रयत्नपूर्वक अंगुलियों से घेर लें। यह चक्रमुद्रा कहलाती है। गदामुद्रा ततः परम् ।।32।। अन्योन्याभिमुखाश्लिष्टाङ्गुलिः प्रोन्नतमध्यमा । इसके वाद गदा मुद्रा कही जाती है। दसो अंगुलियों को एक दूसरे के सम्मुख गूंथ कर मध्यमा को ऊपर उठावें। अथाङ्गुष्ठद्वयं मध्ये दत्वापि परितः करौ ।।33।। मण्डलीकरणी सम्यगङ्गुलीनां तपोधन । पद्ममुद्रा भवेदेषा हे तपोधन सुतीक्ष्ण! बीच में दोनों हाथों के अंगूठे को सटाकर इसके चारों ओर दोनों हाथों की शेष आठ अंगुलियों से मण्डल बनावें। यह पद्ममुद्रा कहलाती है। पद्ममुद्रा धेनुमुद्रा धेनुमुद्रा ततः परा ।।34।। अनामिकाकनिष्ठाभ्यां तर्जनीभ्यां च मध्यमे। अन्योन्याभिमुखाश्लिष्टे दोनों हाथों की अंगुलियों को एक दूसरे से गूँथकर अनामिका से कनिष्ठिका, कनिष्ठिका से अनामिका तथा तर्जनी से मध्यमा और मध्यमा से तर्जनी को सटा देने पर धेनुमुद्रा या सुरभि मुद्रा बनती है। ततः कौस्तुभसंज्ञिका ।।35।। कनिष्ठेन्योन्यसंलग्नेऽभिमुखे च परस्परम्। वामस्य तर्जनीमध्ये मध्यानामिकयोरपि । वामानामिकसंस्पृष्टे तर्जनीमध्यशोभिता। पययिण नताङ्गुष्ठाद्वयी कौस्तुभलक्षणा ।।37।।