भारतकोश
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

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पृष्ठ 190

अष्टादशोऽध्यायः (129) इसके बाद कौस्तुभ मुद्रा कही गयी है। दोनों कनिष्ठा को आमने-सामने एक दूसरे से सटाकर वाम हाथ के तर्जनी, मध्यमा और अनामिका के बीच बायीं अनामिका को छूती हुई तर्जनियों के बीच रखकर बारी-बारी से दोनों अंगूठा को नीचे झुकाकर कौस्तुभ मुद्रा बनती है। कनिष्ठान्योन्यसंलग्ना विपरीतं नियोजिता। अधस्तात् प्रापिताङ्गुष्ठा मुद्रा गरुडसंज्ञका।।३८।। कनिष्ठा अंगुलियों को एक दूसरे के विपरीत संलग्न कर उन्हें अंगूठे के नीचे रखने से गरुड़मुद्रा बनती है। वनमाला मुद्रा योनिमुद्रा तर्जन्यङ्गुष्ठमध्यस्था मध्यमानामिकाद्वयी। कनिष्ठानामिकामध्ये तर्जन्यग्रकरद्वयी।।३९।। मुने श्रीवत्समुद्रेयं तर्जनी, अंगूठा, मध्यमा और अनामिका को सटाकर तर्जनी को कनिष्ठा और अनामिका के बीच रखने से श्रीवत्समुद्रा बनती है। वनमाला भवेत् ततः। कनिष्ठानामिकामध्या मुष्टिरुन्नीततर्जनी।।४०।। परिभ्रान्ता शिरस्युच्चैस्तर्जनीभ्यां दिवौकसः। इसके बाद वनमाला होती है। कनिष्ठा, अनामिका के बीच तर्जनी रखकर दोनों हाथों से मुट्ठी बाँधकर दोनों तर्जनी से देवता के हृदय का स्पर्श कर पश्चात् देवता के मस्तक पर तर्जनी को उठाकर घुमावें। Rarest Archiver