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अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

अष्टादशोऽध्यायः (129) इसके बाद कौस्तुभ मुद्रा कही गयी है। दोनों कनिष्ठा को आमने-सामने एक दूसरे से सटाकर वाम हाथ के तर्जनी, मध्यमा और अनामिका के बीच बायीं अनामिका को छूती हुई तर्जनियों के बीच रखकर बारी-बारी से दोनों अंगूठा को नीचे झुकाकर कौस्तुभ मुद्रा बनती है। कनिष्ठान्योन्यसंलग्ना विपरीतं नियोजिता। अधस्तात् प्रापिताङ्गुष्ठा मुद्रा गरुडसंज्ञका।।३८।। कनिष्ठा अंगुलियों को एक दूसरे के विपरीत संलग्न कर उन्हें अंगूठे के नीचे रखने से गरुड़मुद्रा बनती है। वनमाला मुद्रा योनिमुद्रा तर्जन्यङ्गुष्ठमध्यस्था मध्यमानामिकाद्वयी। कनिष्ठानामिकामध्ये तर्जन्यग्रकरद्वयी।।३९।। मुने श्रीवत्समुद्रेयं तर्जनी, अंगूठा, मध्यमा और अनामिका को सटाकर तर्जनी को कनिष्ठा और अनामिका के बीच रखने से श्रीवत्समुद्रा बनती है। वनमाला भवेत् ततः। कनिष्ठानामिकामध्या मुष्टिरुन्नीततर्जनी।।४०।। परिभ्रान्ता शिरस्युच्चैस्तर्जनीभ्यां दिवौकसः। इसके बाद वनमाला होती है। कनिष्ठा, अनामिका के बीच तर्जनी रखकर दोनों हाथों से मुट्ठी बाँधकर दोनों तर्जनी से देवता के हृदय का स्पर्श कर पश्चात् देवता के मस्तक पर तर्जनी को उठाकर घुमावें। Rarest Archiver

(130) अगस्त्य-संहिता मुद्रा योनिसमाख्याता स्यात् करद्वयदर्शिता ।।41।। तर्जन्याकृष्टमध्यान्ता स्थितानामिकयुग्मका। मध्यमूलस्थिताङ्गुष्ठा ज्ञेया शस्तार्चने मुने।।42।। योनि नामक मुद्रा दोनों हाथों से दिखायी जाती है। दोनों मध्यमाओं के नीचे से बायीं तर्जनी के ऊपर दाहिनी अनामिका और दाहिनी तर्जनी के ऊपर बायीं अनामिका रखकर दोनों तर्जनियों से बाँधकर दोनों मध्यमाओं को ऊपर रखने से यह मुद्रा बनती है, जो देवताओं की अर्चना में प्रशस्त है। एताभिर्दशमुद्राभिः पूर्वोक्ताभिश्च सप्तभिः। यो रामर्चयेन्नित्यं मोदयेत् स सुरेश्वरम् ।।43।। द्रावयेदपि¹ विप्रेन्द्र ततः प्रार्थितमाप्नुयात्। पूर्व में कही गयी सात तथा यहाँ कही गयी दश मुद्राओं से जो नित्य श्रीराम की अर्चना करते हैं, वे देवों के ईश्वर विष्णु को प्रसन्न करते हैं, उन्हें द्रवित भी करते हैं और प्रार्थना की गयी वस्तु प्राप्त करते हैं। लक्षण्यान्यासनानां हि वक्ष्यामि मुनिसत्तम ।।44।। तानि स्वस्तिकभद्राब्जवीरादीनि भवन्ति वै। हे मुनिश्रेष्ठ! अब मैं आसनों का लक्षण कहता हूँ। आसन स्वस्तिक, भद्रासन, पद्मासन, वीरासन आदि अनेक प्रकार के होते हैं। कृत्वोत्तानौ क्षितौ पादौ तत्रैवोरुद्वयं समम् ।।45।। निधाय निश्चलं ह्येतत् स्वस्तिकं कीर्त्यते मुने। दोनों पैरों को पृथ्वी पर अपने सामने फैलाकर दोनों जंघाओं को समान कर अविचल होकर बैठें। यह स्वस्तिक मुद्रा कहलाती है। ( प्रयोग में बायें पैर को दायीं जंघा की मांसपेशियों के बीच तथा दायें पैर को बांयी जंघा के बीच फंसाकर स्थिर होकर बैठने से यह आसन बनता है। पादद्वयं समं जानुद्वयोरपि तु कारितम् ।।46।। भद्रासनमिदं श्रेष्ठं जपेत् तत्तत् फलप्रदम्। दोनों पैरों को समान रूप से दोनों घुटना के ऊपर करने से वज्रासन कहलाता है। इस श्रेष्ठ आसन में जो जप किये जाते हैं वे फलदायी होते हैं।

  1. आचार्य रामकिशोर कृत 'मुद्राप्रकाश' नामक ग्रन्थ में 'मोदयन्ति द्रावयन्ति देवान् इति मुद्राः' यह परिभाषा दी गयी है।

अष्टादशोऽध्यायः (131) पादद्वयं समं ⁃ सम्यगूरुमूलद्वयोपरि ।।47।। कृतं पद्मासनं ह्येतच्छ्रेष्ठं सर्वेषु कर्मसु। दोनों पैरों को भली भाँति जंघा की जड़ के ऊपर रखकर किया गया पद्मासन सभी कर्मों में श्रेष्ठ है। वामपादे निधायाङ्कं मूलं पादं च दक्षिणम्। वामाङ्गाग्रे दृतिर्ह्येतद्¹ वीरासनमुदीरितम् ।।48।। बाँये पैर को जमीन पर टिकाकर घुटना पर बाँयी केहुनी को टिका लें। तथा बायें पैर को मोड़कर भूमि पर रखें। इस स्थिति में वाँयीं ओर दृष्टि केन्द्रित करने पर वह वीरासन कहलाता है। योगासनं चमूष्काधः पाणिं दत्वा पदान्तरम्। जङ्घाद्वयोर्निधायैतद्योगेभीष्टं प्रयच्छति ।।49।। (यहाँ भी पाठ सन्देहास्पद है। अन्यत्र विवरण के अनुसार पद्मासन में बैठकर दोनों ऐँड़ियों को पेट से दबाकर दोनों जंघाओं को एक समान रखकर आगे की ओर कपाल को भूमि से सटाने पर योगासन होता है।) वामाङ्कपाश्र्वे पाणिञ्च दक्षिणं चेतरं पुनः। पाष्ण्र्यन्तरं विधायैवं कुर्याज्जानुद्वयं समम् ।।50।। गोमूत्रासनमेतत् स्यात् सर्वाघौघविनाशनम्। बायीं काँख के को बायीं ऐंड़ी पर तथा दायें काँख को दायीं एड़ी पर टिकाकर दोनों जंघाओं को समानान्तर कर लें। यह गोमूत्रासन कहलाता है, जिससे सभी पाप विनष्ट हो जाते हैं। आसनानि बहूनि स्युरेवमेव जपादिषु ।।51।। येन केनासनेनैव वीरः स्थित्वा जपादिकम्।¹ इस प्रकार जप आदि में अनेक आसन है। किसी भी एक आसन में वीर की तरह निर्वाह करते हुए जप आदि करें। कुर्वीत भक्तियुक्तस्तु भावयेत् पुरुषोत्तमम्।। एवं यः कुरुते पूजाजपहोमादिकं मुने ।।52।। सर्वेषामिह पूज्योऽयमिह लोके परत्र च।

  1. क. में अनुपलब्ध।

(132) अगस्त्य-संहिता भक्तिभाव के साथ उपर्युक्त कर्म करें और पुरुषोत्तम की भावना करें। जो इस प्रकार पूजा, जप, होम आदि करते हैं, वे इस संसार में और परलोक में सबके द्वारा पूजित होते हैं। पूजा जपश्च होमश्च मन्त्राणामुद्धृतिस्तथा।।53।। दीक्षाभिषेकमार्गस्तु दर्शितोऽत्र तपोनिधे। पूजोपकरणादीनां लक्षणान्यपि सुव्रत।।54।। दर्शितानि प्रयत्नेन सर्वं भक्त्यावधारय। सुतीक्ष्णाभिहितं यत्नाद् यदेतद्¹ भुक्तिमुक्तिदम् ।।55।। नावैष्णवेभ्यो वक्तव्यं न श्राव्यमिति मे मतिः। यत्नेन विष्णुभक्ताय चार्हते² देयमित्यपि।।56।। पूजा, जप, होम, मन्त्रों की आहुति तथा दीक्षा और अभिषेक का मार्ग मैंने मूल रूप से बतला दिया। पूजा में प्रयुक्त होनेवाले उपकरणों के लक्षण भी प्रयत्नपूर्वक मैंने बलता दिया, उन सबको भक्तिभाव से समझो। हे सुतीक्ष्ण! मैंने जो पूजा की विधि तुम्हें बतलायी, उसे किसी वैष्णव से भिन्न व्यक्ति के सामने मत बोलना, न उन्हें सुनाना, यह मेरा मत है। विष्णु के भक्त जो इस विधि को ग्रहण करने में समर्थ हों, उन्हें यत्नपूर्वक देना चाहिए, यह भी मेरा मत है। इत्यगस्त्यसंहितायां परमरहस्ये आसनमुद्राप्रदर्शनं नामाष्टादशोऽध्यायः। अथ एकोनविंशोऽध्यायः अगस्तिरुवाच सुतीक्ष्ण मन्त्रवर्येषु श्रेष्ठो वैष्णव उच्यते। गाणपत्येषु शैवेषु शाक्तसौरेष्वभीष्टदः।।1।। वैष्णवेष्वपि सर्वेषु राममन्त्रः फलाधिकः। गाणपत्यादिमन्त्रेषु कोटिकोटिगुणाधिकः।।2।। अगस्त्य बोले- हे सुतीक्ष्ण! गाणपत्य, शैव, शाक्त, सौर मन्त्रों में भी वैष्णव मन्त्र श्रेष्ठ है तथा मनोरथ सिद्ध करनेवाला है। वैष्णव-मन्त्रों में भी राममन्त्र गाणपत्य आदि मन्त्रों में करोड़ों गुना अधिक फल देनेवाला है।

  1. घ. यद्वद्वैष्णवं। 2. क. चार्थिने। 3. घ. ⁰कामदोऽयं।

एकोनविंशोऽध्यायः (133) मन्त्रेषु तेष्वप्यनायासफलदोऽयं³ षडक्षरः। षडक्षरोऽयं मन्त्रस्तु सर्वाघौघनिवारणः।।३।। राममन्त्र भी अनेक हैं; किन्तु उनमें भी अनायास फल देनेवाला यह छह अक्षरों का मन्त्र है। यह छह अक्षरों का मन्त्र सभी पापों का नाश करनेवाला है। मन्त्रराज इति प्रोक्तः सर्वेषामुत्तमोत्तमः। दैनन्दिनं च दुरितं पक्षमासर्तुवर्षजम्।।४।। इसे मन्त्रराज कहा गया है जो सभी मन्त्रों में उत्तम है। पक्ष, मास, ऋतु और वर्ष में किये गये पापों को नाश करने के साथ प्रतिदिन किये गये पाप को भी नाश करता है। सर्वं दहति निःशेषं ऊर्णाजालमिवानलः।¹ ब्रह्महत्यासहस्राणि ज्ञानाज्ञानकृतानि च।।५।। जैसे आग ऊन से बने जाल को निःशेष कर जला देता है, उसी प्रकार यह मन्त्र हजारो ब्रह्महत्या और ज्ञानवश या अज्ञानवश जो पाप किये गये हैं उन्हें जला देता है। स्वर्णस्तेयसुरापानं गुरुतल्पायुतानि च।।६।। कोटिकोटिसहस्राणि ह्युपपातकान्यपि। सर्वाण्यपि शमं यान्ति² राममन्त्रानुकीर्तनात्।।७।। सोने की चोरी, मद्यपान, गुरु की शय्या पर शयन आदि जो करोड़ों करोड़ों महापाप हैं और अनेक उपपातक भी हैं, वे सब श्रीराम के मन्त्र के जप से शान्त हो जाते हैं। भूतप्रेतपिशाचाद्याः कूष्माण्डाः ग्रहराक्षसाः। दूरादेव पलायन्ते³ राममन्त्रप्रभावतः⁴।।८।। भूत, प्रेत, पिशाच, कूष्माण्ड, ग्रह, राक्षस श्रीराम के मन्त्र के प्रभाव से दूर भाग जाते हैं। मालिन्यमपि सांकार्यं यच्च यावच्च दूषितम्। सर्वं विलयमाप्नोति राममन्त्रे तु कीर्तिते।।९।।

  1. घ. तूर्णाचलमिवानलः। 2. घ. विनश्यन्ति। 3. क. प्रधावन्ति। 4. राममन्त्रप्रसादतः। ५ शामिताः।

(134) अगस्त्य-संहिता मलिनता, संकरता और जो जितने दोष हैं, सब श्रीराम का मन्त्र जपने से विलुप्त हो जाते हैं। आब्रह्मबीजदोषाश्च नियमातिक्रमोद्भवाः। स्त्रीणाञ्च पुरुषाणां स्युर्मन्त्रेणानेन नाशिताः⁵।।१०।। ब्रह्म से लेकर उत्पत्ति के बीज पर्यन्त जो दोष होते हैं या नियम का त्याग करने से स्त्रियों और पुरुषों में जो दोष उत्पन्न होते हैं, वे सब इस मन्त्र से नष्ट हो जाते हैं। येषु येष्वेष्वपि देशेषु रामः परमुपास्यते।।११।। दुर्भिक्षादिभयान्येषु न भवन्ति कदाचन। जिन जिन देशों में श्रीराम परम देवता के रूप में पूजित होते हैं, वहाँ दुर्भिक्ष आदि का भय कभी नहीं रहता। शान्तः प्रसन्नो वरदोऽक्रोधनो भक्तवत्सलः।।१२।। अनेन सदृशो मन्त्रो जगत्स्वपि न विद्यते।¹ संसार में इस मन्त्र के समान शान्त, प्रसन्न, वर देनेवाला, सौम्य तथा भक्तों के प्रति संतान का भाव रखनेवाला मन्त्र नहीं है। अनेनाराधितो रामः प्रसीदत्येव सत्वरम्।।१३।। प्रददात्यायुरैश्वर्यं² सम्मानोत्तमतामपि। इस मन्त्र से पूजित श्रीराम शीघ्र ही प्रसन्न होते हैं और आयु, ऐश्वर्य, सम्मान तथा श्रेष्ठता प्रदान करते हैं। य एवमुक्तमार्गेण मन्त्राराधनतत्परः।।१४।। सकामो भुक्तिमाप्नोति निष्कामो मुक्तिमेति च। प्राप्नोत्युभयकामस्तु भुक्तिं मुक्तिं न संशयः।।१५।। जो इस प्रकार पूर्वोक्त पद्धति से मन्त्र के आराधन में तत्पर होते हैं, वे सकाम होने पर भोग प्राप्त करते हैं और निष्काम होने पर मुक्त हो जाते हैं और दोनों चाहनेवाले भोग और मोक्ष दोनों प्राप्त करते हैं इसमें सन्देह नहीं। सुतीक्ष्ण उवाच श्रुतिस्मृतिपुराणार्थनिश्चय ज्ञानवित्तम। सन्देहं छिन्धि पृच्छामि तातात्रानुग्रहं कुरु।।१६।।

  1. घ. में अनुपलब्ध। 2. घ. ददात्यायुष्यमैश्वर्यं।

(135) — — — — — — — — — — एकोनविंशोऽध्यायः — — — — — — — — — — सुतीक्ष्ण बोले— हे ज्ञानियों में श्रेष्ठ महामुनि अगस्त्य! आपने वेद और पुराणों के प्रयोजन के विषय में सब कुछ जानकर उसका निश्चय कर लिया है। हे तात! मेरे मन में एक सन्देह है। मैं पूछ रहा हूँ। इस सन्देह का निवारण करें। इस विषय में आप कृपा करें। आत्मानुभवरूपेण साक्षात्कारेण केवलम्। पुनरावृत्तिरहितं शाश्वतं ब्रह्म यात्यपि।।17।। इति श्रुत्यादितत्त्वज्ञाः प्रवदन्ति मनीषिणः। वेद आदि का तत्त्व जाननेवाले मनीषीगण कहते हैं कि आत्मा का जब अनुभव होता है, तब ब्रह्म के साथ साक्षात्कार कहलाता है, उससे इस संसार में पुनर्जन्म से रहित नित्य ब्रह्म की प्राप्ति होती है। श्रीमत्ताभिहितं राममन्त्रानुष्ठानतत्पराः। भुक्तिं मुक्तिं च विन्दन्ति कथमेतन्निबोधय।।18।। किन्तु आपने कहा है कि श्रीराम के मन्त्र का जो अनुष्ठान करते हैं, वे भोग और मोक्ष दोनों पा लेते हैं। यह कैसे होता है यह हमें बतलायें। निवृत्तिरेव मुक्तिश्च प्रवृत्तिर्भुक्तिरुच्यते। उभयोरप्येक एव कथं मार्गो भवेद् वद।।19।। जब विमुख होना मुक्ति है और प्रवृत्त होना भुक्ति है, तब दोनों विपरीत वस्तुओं का एक मार्ग कैसे हो सकता है? अगस्तिरुवाच त्वया चैव यदुक्तं यत् सत्यं सत्यविदां वर। सर्वजन्मसुखोच्छित्तिर्दुःखोच्छित्तिश्च तत्त्वतः।20।। निवृत्तिलक्षणा ह्येषा मुक्तिरित्यभिधीयते। अगस्त्य ने कहा— हे सत्यवादियों में श्रेष्ठ, सुतीक्ष्ण! तुमने जो कहा वह सत्य है। वस्तुतः जन्म-ग्रहण सम्बन्धी सभी सुखों तथा दुःखों का नाश, जो एक प्रकार का त्याग है, मुक्ति के नाम से जाना जाता है। विषयात्यन्तसंसर्गः करणानां हृदा सह।।21।। भुक्तिः प्रचक्ष्यते लोके वैषम्यमुभयोरपि।

(136) अगस्त्य-संहिता भोग के साधनों का हृदय के साथ जो अत्यन्त संयोग है, वह संसार में भोग कहा जाता है। इस प्रकार दोनों एक दूसरे से अलग है। तथाथात्मानुसन्धानमुभयत्रापि दृश्यते।।22।। मुक्तिरात्मानुसन्धाने चात्मावस्थानमेव हि। एतदस्त्येव तत्त्वञ्च सर्वतत्त्वविदां सताम्। ।23।। प्रवृत्तौ च निवृत्तौ च सर्वदात्मानुभाविनाम्। चूँकि आत्मा का अनुसंधान दोनों ही स्थलों पर है और आत्मा के अनुसंधान के द्वारा आत्मा में स्थित होना मुक्ति है। हे तत्त्वज्ञ! यही कारण है कि प्रवृत्ति और निवृत्ति दोनों में हमेशा आत्मा का ही अनुभव होता है, यही दोनों में साम्य है। किञ्च रामोऽहमित्येव सर्वदानुस्मरन्ति ये।।24।। न ते संसारिणो नूनं राम एव न संशयः। और भी, 'मैं राम हूँ' ऐसा जो हमेशा चिन्तन करते हैं, वे संसारी न होकर राम-स्वरूप हो जाते हैं, इसमें सन्देह नहीं। राम एवात्र भोक्ता च भोग्यमाद्यं¹ भुजि क्रिया।।25।। एतस्मिन्नविशिष्टे तु किमसत् सत्रसंजनम्। अतो न मुक्तिमार्गस्य रोधिनी भुक्तिरिष्यते।।26।। हे आर्य सुतीक्ष्ण! श्रीराम ही भोक्ता हैं, प्रथम भोग्य हैं तथा भोजन रूप क्रिया भी वे ही है। उनके अविशिष्ट अर्थात् सामान्य अर्थात् सबमें उपस्थित रहने पर कौन सा असत् उत्पन्न हो सकता है? अतः भोग मोक्ष के मार्ग का अवरोधक नहीं है। अनेन विधिना रामं य एवमनुतिष्ठति। स भुक्तिमपि मुक्तिञ्च लभते नात्र संशयः।।27।। इस विधि से जो श्रीराम का अनुष्ठान करते हैं, वे भोग और मोक्ष दोनों प्राप्त करते हैं, इसमें सन्देह नहीं। यथा विधिनिषेधौ तु मुक्तिं नैवापसर्पतः। तथा न स्पृशतो रामोपासकं विधिपूर्वकम्।।28।।

  1. क. एवं घ. भोज्यमाद्यं।

(137) एकोनविंशोऽध्यायः जिस प्रकार विधि और निषेध दोनों मुक्ति की ओर ही जाते हैं, उसी प्रकार विधिपूर्वक रामोपासक को वे दोनों स्पर्श भी नहीं कर पाते। सदा रामोऽहमित्येव चिन्तयेदप्यनन्यधीः। न तस्य विहितं लोके निषिद्धं च न विधीयते।।२८।। 'मैं सदा श्रीराम हूँ' ऐसा एकाग्र होकर सोचें। ऐसे व्यक्ति के लिए संसार में कोई विधान अथवा निषेध नहीं रह जाता है। यथा घटश्च कलश एकार्थस्याभिधायकः। तथा ब्रह्म च रामश्च नूनमेकार्थतत्परः।।२९।। जैसे 'घट' शब्द एवं 'कलश' शब्द दोनों एक ही पदार्थ का अभिधान करते हैं। उसी प्रकार 'ब्रह्म' और 'राम' शब्द का एक ही अर्थ होता है। अतो रामोऽहमित्येव तात्पर्यं प्रवदन्ति ये। रामनामत एव स्युर्न तेषां विहितादिकम्।।३०।। इसलिए 'मैं राम हूँ' यही भाव जो बोलते हैं, वे श्रीराम के नाम के कारण राम ही हो जाते हैं, उनके लिए विधि-निषेध आदि नहीं होते। दातव्यमस्मै ददति ये यावत्किञ्चिदन्वहम्। उदकौदनवस्त्राणि रामायैव न संशयः।।३१।। अतो ब्रह्मविदे दत्तमानन्त्याय प्रकल्प्यते। 'ऐसे भक्त को यह दे रहा हूँ' ऐसा सोचकर जो जितनी मात्रा में जल, भात, वस्त्र आदि दान करते हैं, वे राम को ही समर्पित करते हैं, इसमें सन्देह नहीं। इसलिए ब्रह्मज्ञानी को दिया गया दान अनन्त फल देनेवाला होता है। ये दुष्यन्त्यपि निन्दन्ति तत्पापफलभागिनः।।३२।। ¹कुटुम्बिनो दरिद्राः स्युर्दुःखिनः स्युर्न संशयः। जो ब्रह्मज्ञानियों का दोष निकालते हैं, उनकी निन्दा करते हैं, वे उस पाप के भागी होते हैं। वे दुःखी होते हैं तथा उनके परिवार के लोग भी दुःखी होते हैं। ततः सुतान् समुत्पाद्य स्वयमेव दहेदपि।।३३।। कारागृहेषु सर्वेषु निर्निमित्तं निगृह्यते। तब वे अनेक पुत्रों को उत्पन्न कर स्वयं भी जलते रहते हैं तथा सभी प्रकार के बन्धन रूपी कारागार में विना किसी कारण के बाँधे जाते हैं।

  1. घ. यहाँ से दो श्लोक तक क. में अनुपलब्ध। 2. घ. कृतेप्सुभिः। Rarest Archiver

(138) अगस्त्य-संहिता अहो स्वजनभाग्यस्य यथावत्तत् क्षयं भवेत्।।34।। अतो ब्रह्मविदां द्वेषो न कर्त्तव्यः शुभेच्छुभिः²। निन्दा चैव न कर्त्तव्या हितमेव समाचरेत्।।।35।। अपने कुटुम्बों के भाग्य की तरह उनका भी ह्रास होता है। अतः जो अपनी भलाई चाहते हों, वे ब्रह्मज्ञानियों से द्वेष न करें, उनकी निन्दा न करें; केवल भलाई का कार्य करें। ये स्तुवन्त्यनुमोदन्ति ददत्यस्मै मनीषिणः। तत्पुण्यमखिलं लब्ध्वा तद्गतिं प्राप्नुवन्त्यपि।।36।। जो उनकी स्तुति करते हैं; उनका समर्थन करते हैं, उन्हें दान देते हैं वे बुद्धिमान् व्यक्ति अपने सभी कर्मों से उनके पुण्यों को पाकर उनकी गति को भी प्राप्त करते हैं। ज्ञात्वा तमेवमात्मानं कृत्यं कुरु निरन्तरम्। एतेनैव तवाभीष्टं भविष्यति न संशयः।।37।। उसी आत्मा को जानकर लगातार कर्म करो। इसी से तुम्हारा अभीष्ट सिद्ध होगा, इसमें सन्देह नहीं। त्यज¹ दुर्जनगोष्ठीषु विहारेच्छां समाचर। हितमेव सतां नित्यमहिंसातत्परो भव।।38।। दुर्जनों की गोष्ठी में स्वच्छन्द होकर रंगरेलियाँ मनाने की इच्छा न करो; प्रतिदिन सज्जनों के कल्याण की बात करो और अहिंसा के लिए कमर कस लो। तत्प्राप्तिसाधनान्यष्टौ तानि वक्ष्यामि तच्छृणु। यमो नियमसंज्ञश्च आसनं च तृतीयकम्।।39।। प्राणायामश्चतुर्थश्च प्रत्याहारश्च पञ्चमः। धारणा च तथा ध्यानं समाधिरिति सत्तम।।40।। हे सत्तम! उस श्रीराम को पाने के आठ साधन हैं, जिन्हें सुनो- यम, नियम और तीसरा आसन, चौथा प्राणायाम, पाँचवाँ प्रत्याहार इसके बाद धारणा, ध्यान और समाधि।

  1. घ. त्यजन्।

_ _ _ _ _ _ _ _ _ एकोनविंशोऽध्यायः _ _ _ _ _(139) प्रत्येकमेषां वक्ष्यामि लक्षणानि च सुव्रत। तद्विविच्य प्रवक्ष्यामि तत्तल्लक्षणमप्यहो।।41।। हे सुव्रत! इनके प्रत्येक का लक्षण मैं कहूँगा फिर उनका विवेचन कर उनका लक्षण कहूँगा। अहिंसा सत्यमस्तेयं ब्रह्मचर्यं दयार्जवम्। क्षमा धृतिर्मिताहारः शौचं चेति यमाः दश।।42।। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, दया, कोमलता, क्षमा, धैर्य, मिताहार, शौच ये दश यम हैं। सर्वेषामपि जन्तूनामक्लेशजननं पुनः। वाङ्मनः कर्मभिर्नूनमहिंसेत्यभिधीयते।।43।। सभी प्राणियों को वचन, मन एवं कर्म से कष्ट न पहुँचाना अहिंसा कही जाती है। यथादृष्टश्रुतार्थानां स्वरूपकथनं पुनः। सत्यमित्युच्यते धीरैस्तद् ब्रह्मप्राप्तिसाधकम्।।44।। जैसा देखा गया हो और सुना गया हो, उसी रूप में यदि पुनः कहा जाये तो उसे धीरों ने सत्य कहा है, यह सत्य ब्रह्म की प्राप्ति का साधक है। तृणादेरप्यनादानं परस्य चेत् तपोधन। अस्तेयमेतदप्यङ्ग ब्रह्मप्राप्तेः सनातनम्।।45।। हे अंग! सुतीक्ष्ण! दूसरे का घास तक नहीं लेना अस्तेय है, जो ब्रह्म की प्राप्ति का सनातन साधन है। अवस्थास्वपि सर्वासु कर्मणा मनसा गिरा।¹ स्त्रीसंगतिपरित्यागो ब्रह्मचर्यं प्रशिक्षते।।46।। सभी अवस्थाओं में कर्म, मन एवं वचन से स्त्री की संगति का परित्याग ब्रह्मचर्य कहलाता है। परेषां दुःखमालोक्य स्वस्येवालोच्य तस्य तु। उत्सादानानुसंधानं दयेति प्रोच्यते बुधैः।।47।।

  1. घ. मनसापि वा।

(140) अगस्त्य-संहिता दूसरों का दुःख देखकर 'यह दुःख मेरा है' ऐसा समझकर उसे हटाने हेतु जो चिन्तन किया जाये, उसे बुद्धिमान् दया कहते हैं। व्यवहारेषु सर्वेषु मनोवाक्कायकर्मभिः। सर्वेषामपि कौटिल्यराहित्यं त्वार्जवं भवेत् ।।48।। सभी प्रकार के व्यवहारों में मन, वचन एवं कर्म से सबके प्रति कुटिलता का त्याग करना कोमलता है, वह लाना चाहिए। सर्वात्मना सर्वदापि सर्वत्राप्यपकारिषु। बन्धुष्विव समाचारः क्षमा स्याद् ब्रह्मवित्तम ।।49।। हे ब्रह्मज्ञानियों में श्रेष्ठ! हर प्रकार से, हमेशा, हर स्थान पर अपकार करनेवालों के प्रति भी भाई-बन्धु के समान आचरण करना क्षमा है। इच्छाप्रयत्नराहित्यं यातेषु विषयेष्वपि। नो भवेत् तां धृतिं धीराः प्रवदन्ति सतां वरः ।।50।। बीती हुई बातों के सम्बन्ध में इच्छा और उसके लिए प्रयत्न न करना धृति कहलाता है ऐसा धीर लोग कहते हैं। भोज्यस्यैव चतुर्थांशं भोजनं स्वस्थचेतसः। अत्युष्णकटुतिक्ताम्ललवणादिविवर्जितम्¹ ।।51।। हितं मेध्यं सुतीक्ष्णैतन्मिताहारं प्रवक्ष्यते। जितना भोजन कर सकते हों, उसका चौथाई भाग ही भोजन है। वह अधिक गरम, कड़वा, तीता, खट्टा, नमकीन नहीं होना चाहिए। भोजन हितकर हो और पवित्र हो। वैसा भोजन करना मिताहार कहलाता है। निर्गतं रोमकूपेभ्यो नवरन्ध्रेभ्य एव च ।।52।। मलं वदन्ति द्वाराणां क्षालनं शौचमुच्यते। मृज्जलाभ्यां बहिः सम्यक् निर्मलीकरणं पुनः ।।53।। पूर्वोक्तभूतशुद्धान्तं शौचमाचक्षते बुधाः। एते दश यमाः ब्रह्मन् ब्रह्मसम्प्राप्ति हेतवः ।।54।। शरीर के नौ छिद्र एवं रोमकूपों से निकले हुए पदार्थ को मल कहते हैं। इनके द्वारों को प्रक्षालित करना शौच कहा जाता है। मिट्टी और जल से शरीर के

  1. घ. अत्युष्णकटुताम्बूललवणादिविवर्जितम्। 2. घ. सिद्धान्तलक्षणम्।

एकोनविंशोऽध्यायः (141)

बाहरी अंगों का शुद्धीकरण होता है तथा पूर्वोक्त विधि से भूतशुद्धि पर्यन्त शुद्धि को बुद्धिमान् लोग शौच कहते हैं। हे ब्रह्मन्! ये दश यम हैं, जो ब्रह्म-प्राप्ति के साधन हैं। तपश्च तुष्टिरास्तिक्यं ईश्वराराधनं तथा। सिद्धान्तावेक्षणं² चैव लज्जा दानं मतिस्तथा।।55।। जपो व्रतं दशैतानि सुतीक्ष्ण नियमाः स्मृताः। तप, तुष्टि, आस्तिक्य भावना, ईश्वर की आराधना, सिद्धान्तों का अवलोकन करना, लज्जा, दान, मति, जप और व्रत ये दश नियम कहे गये हैं। प्रत्येकमेषां वक्ष्यामि लक्षणानि तपोनिधे।।56।। तपस्त्वनशनं नाम विधिपूर्वकमिष्यते। अनायासोपवासेन तृप्त्यर्थं¹ नैव जीवनम्।।57।। तुष्टिरेषावधार्य्यैतत् तत्प्राप्तिर्नानया विना। श्रुत्याद्युक्तेषु विश्वास आस्तिक्यं स प्रचक्षते।।58।। हे तपोनिधि सुतीक्ष्ण! इनमें से अब प्रत्येक का लक्षण कहता हूँ। विधानपूर्वक और विना प्रयास किये हुए भोजन नहीं करना तप कहलाता है। 'मेरा जीवन तृप्ति के लिए नहीं है' तथा 'जीवन तृप्ति के बिना भी व्यर्थ नहीं है' यह धारणा बनाकर रहना तुष्टि है। वेदादि शास्त्रों में उक्त सिद्धान्तों पर विश्वास करना आस्तिक्य है। इष्टदेवार्चनं सम्यक् विधिपूर्वकमन्वहम्। त्रिसन्ध्यमेकवारन्तु भवत्येवेश्वरार्चनम्।।59।। प्रतिदिन तीनों सन्ध्या में अथवा एक बार प्रातःकाल में विधानपूर्वक अपने इष्टदेव की आराधना ईश्वर की आराधना है। वैष्णवागमसिद्धान्तश्रवणं मननं तथा। श्रुतिस्मृतिपुराणादिमध्यान्तोदर्कदर्शनम् ।।60।। सिद्धान्तश्रवणं ह्येतत् प्रोच्यते तत्त्वदर्शिभिः। वैष्णवागम के सिद्धान्त का श्रवण, मनन, वेद, स्मृति, पुराण आदि के श्रवण के मध्य तथा अन्त में उसके परिणाम के भी दर्शन को तत्त्वज्ञानियों ने सिद्धान्त-श्रवण कहा है।

  1. घ. तृप्त्युत्पत्त्यैव जीवनम्।

(142) अगस्त्य-संहिता — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — श्रुत्यादिभिर्लौकिकैश्च यद्यदत्यन्तनिन्दितम्।।61।। तत्राप्रवर्तनं लज्जा वाङ्मनःकर्मणामपि। वेद या लोक में जो अत्यन्त निन्दित कर्म माना गया हो, उन कार्यों को को नहीं करना वाणी, मन और कर्मों की लज्जा है। यदिष्टदेवतां ध्यात्वा तदर्पणधियान्वहम्।।62।। सत्पात्रे दीयतेन्नादि^1 तद्दानमभिधीयते। अपने इष्टदेव का ध्यान कर उन्हें समर्पित करने की बुद्धि से प्रतिदिन जो अन्नादि दिया जाता है, उसे दान कहते हैं। तर्कैस्तदनुसन्धानं^2 सम्यक् सदसतोरपि।।63।। शास्त्रोक्तयोर्मतिरयं तत्त्वविद्भिरुदीर्यते। तर्क कर शास्त्र में उक्त अच्छे और बुरे का अनुसंधान कर तत्त्व-ज्ञान तत्त्वज्ञानियों के द्वारा मति कही गयी है। गुरोर्लब्धस्य मन्त्रस्य शश्वदावर्त्तनं हि यत्।।64।। अन्तरङ्गाक्षराणां च न्यासपूर्वो जपो भवेत्। न्यास करके करना गुरु से प्राप्त मन्त्र के अन्तर्गत आये अक्षरों की बार बार आवृत्ति जप कहलाता है। कर्तव्यस्य समस्तस्य नियमग्रहणं व्रतम्।।65।। सभी कर्तव्यों को नियमपूर्वक स्वीकार करना व्रत कहलाता है। नियमव्यतिरेकेण सर्वं भवति निष्फलम्। अतो नियमतः सर्वं कृत्यं साफल्यमाप्नुयात्।^3।।66।। नियम के विपरीत सभी कार्य निष्फल हो जाते हैं, अतः नियमपूर्वक सभी कृत कर सफलता पायें। इत्यगस्त्यसंहितायां परमरहस्ये यमनियमव्रतो नाम एकोनविंशोऽध्यायः।


  1. घ. दीयतेऽर्थादि। 2. घ. स्वतस्तदनुसंधानम्। 3. घ. यमैश्च नियमैश्चैव कृतं यत् सफलं भवेत्। Rarest Archiver

विंशोऽध्यायः (143) अथ विंशोऽध्यायः अगस्त्य उवाच एकत्रैव स्थिरीभावः पूर्वोक्तनियमैः सह। मूलार्पितशरीरस्य एतदासनमुच्यते।।1।। पूर्वोक्त नियमों का पालन करते हुए मूलाधार में अर्पित शरीर का एक स्थान पर स्थिर रहना आसन कहलाता है। प्राणायामाँस्तथा वक्ष्ये मुमुक्षोरुपकारकान्। यैः कृतैर्दह्यतेऽघौघः शुष्केन्धनगिरिर्मुने।।2।। अब मोक्ष चाहनेवालों के उपकारक प्राणायामों के विषय में कहता हूँ, जिन्हें करने से पाप समूह रूपी सूखी लकड़ी का पहाड़ भस्म हो जाता है। इन्द्रियेष्वपि ये दोषा वातपित्तकफोद्भवाः। त्वगसृङ्मांसमेदोत्थाः मज्जास्थिचर्मसम्भवाः। 1 ।।3।। एतेऽपि सर्वे दह्यन्ते प्राणस्यान्तर्निरोधनात्। प्रायश्चित्तमघौघानां मुख्यमेतद् वदन्ति हि।।4।। वात, पित्त एवं कफ के कारण त्वचा, रक्त, मांस, मेद, मज्जा, अस्थि एवं चर्म में उत्पन्न जो इन्द्रियों में दोष हैं, वे भी प्राणवायु को अन्तः में रोकने से जल जाते हैं। पाप समूह का भी यह मुख्य प्रायश्चित्त कहा गया है। पुनरावृत्तिरहितं शाश्वतं ब्रह्मकांक्षिभिः। प्राणायामश्च सततं कर्तव्यो विधिवन्मुने।।5।। पुनर्जन्म से रहित तथा शाश्वत पद एवं ब्रह्म का साक्षात्कार करने की इच्छा रखनेवालों के द्वारा विधानपूर्वक प्राणायाम सदा करना चाहिए। सम्यङ्निरुध्य च प्राणानन्तःकरणमात्मनि। स्वयमेवात्र शिष्टः सन् ब्रह्मभूयाय कल्पते।।6।। प्राणवायु को सम्यक् रूप से रोककर आत्मा में अन्तःकरण को प्रविष्ट कराकर स्वयं को इस स्थिति में तटस्थ रखकर साधक ब्रह्म स्वरूप हो जाता है।

  1. घ. त्वगसृङ्मांसमेदोऽस्थिमज्जान्त्रशुक्रसम्भवाः।

(144) अगस्त्य-संहिता जानुबिम्बं कराग्रेण त्रिः परामृश्य सत्त्वरम्। प्रदद्याच्छोटिकामेकामियं मात्रा कनीयसी ।।7।। मध्यमा द्विगुणा चैव सा ज्येष्ठा त्रिगुणा स्मृता। अधमो मध्यमश्चैव प्राणायामस्तथोत्तमः ।।9।। जानुमण्डल के ऊपर हथेली को शीघ्रतापूर्वक तीन बार फिराकर एक बार चुटकी बजाने में जो समय लगता है, उसे छोटी मात्रा कहते हैं। इसी दुगुनी मात्रा मध्यमा कहलाती है और तीन गुनी श्रेष्ठ मात्रा कहलाती है। इसी प्रकार प्राणायाम भी अधम, मध्यम और उत्तम भेद से प्राणायाम तीन प्रकार के होते हैं। अधमः पञ्चदशभिः त्रिंशद्भिर्मध्यमो भवेत्। मात्राभिरुत्तमः पञ्चचत्वारिंशद्भिरुच्यते ।।10।। प्राणायामैः कृतै शश्वत् कृतैः षोडशभिर्मुने। दिने दिने च च यत्पापं तत्सर्वं नश्यति ध्रुवम् ।।11।। परोपतापजं पापं परद्रव्यापहारजम्। परस्त्रीमैथुनोत्पन्नं प्राणायामैः शतं दहेत् ।।12।। पन्द्रह मात्राओं से अधम, तीस मात्राओं का मध्यम तथा पैंतालीस मात्राओं का उत्तम प्राणायाम है। नियमित रूप से सोलह बार प्राणायाम कर प्रतिदिन के पाप को नाश कर लेता है। दूसरे को कष्ट देने से, दूसरे का धन छीनने से, परायी स्त्री से मैथुन करने से जो पाप होते हैं, वे सौ बार प्राणायामों से जल जाते हैं। महापातकजातानि ब्रह्महत्याशतानि च। सर्वाण्यपि प्रदह्यन्ते प्राणायामैश्चतुःशतैः ।।13।। महापातकों का समूह तथा सैकड़ो ब्रह्महत्या का पाप, ये सभी चार सौ प्राणायाम से जल जाते हैं। आदावन्ते च यत्नेन प्राणायामं समाचरेत्। कर्मस्वपि समस्तेषु शुभेष्वप्यशुभेषु च।।14।। सभी शुभ एवं अशुभ कर्म के प्रारम्भ और अन्त में यत्नपूर्वक प्राणायाम करना चाहिए।

  1. घ. ०विधिवन्मुने।

विंशोऽध्यायः (145) प्राणायामैर्विना यद्यत् कृतं कर्म निरर्थकम्। अतो यत्नेन कर्तव्या प्राणायामाः शुभार्थिना।।15।। प्राणायाम के विना जो जो कर्म किए जाते हैं, वे व्यर्थ हो जाते हैं। अतः शुभ चाहनेवाले यत्नपूर्वक प्राणायाम करें। यावच्छक्यं नियम्यासून मनसैव जपेन्मनुम्। रामं मुहुर्मुहुर्ध्यायन् पूर्वोक्तविधिवत्सुधीः¹।।16।। जबतक सम्भव हो प्राणवायु को रोककर श्रीराम का ध्यान करते हुए मन ही मन मन्त्र पूर्वोक्त विधि से जप करें। ¹धारयन्नन्तरं वासून नेत्रे किञ्चिन्निमील्य च। परं ज्योतिः परं ध्यायन्नन्तरेव मनुर्जपेत्।।17।। अथवा प्राणवायु को भीतर में धारण कर दोनों आँखें थोड़ा बन्द कर परम ज्योतिःस्वरूप परमात्मा का ध्यान करते हुए मन ही मन मन्त्र का जप करें। आपादमस्तकं सम्यक् प्रविशत्यनिलो यथा। यावतीभिस्तुमात्राभिरिन्द्रियाण्यपि धावतः।।18।। प्रक्षुभ्यति शरीरं च तावन्मात्रं सुसंयमः। जितनी मात्राओं के बराबर समय में मस्तक से पैर तक तथा सभी इन्द्रियों तक जैसे वायु प्रविष्ट हो रहा हो तथा शरीर हिलने लगे, उतनी मात्राओं तक प्राणायाम करना चाहिए। प्राणायामैर्विना यस्य जपहोमार्चनादिकाः।।19।। न फलन्त्येव ताः सर्वाः यत्नेनापि कृताः क्रियाः। प्राणायाम के विना जप, होम, अर्चन आदि क्रियाएँ करते हैं, वे सफल नहीं होते हैं; चाहे वे क्रियाएँ यत्न से क्यों न किये जाएँ। इन्द्रियाणां हृदा सार्द्धं विषयेभ्यो निवर्तनम्।।20।। प्रत्याहारो भवेदेतत् सम्यगिन्द्रियनिग्रहः। इन्द्रियों को अपने अपने विषयों से विमुख करनेवाला तथा हृदय के साथ संयोग करानेवाला प्रत्याहार है; इससे सम्यक् प्रकार से इन्द्रिय-निग्रह होता है।

  1. घ. यहाँ से छह चरण अनुपलब्ध।

(146) अगस्त्य-संहिता

जीवस्य ब्रह्मरूपेण निर्द्धारो वाथ युक्तिभिः ।।21।। पूर्वोक्ता या तु मात्राख्या प्राणायामत्रयोद्भवा। आत्मन्यपि स्थिरीकारश्चित्तस्येवात्र धारणा ।।22।। जीव को ब्रह्म के रूप में युक्तियों के द्वारा निर्धारित करना धारणा है अथवा पूर्व में कही गयी मात्रा से तीन बार प्राणायाम कर आत्मा में चित्त को स्थिर करना धारणा है। सम्यगालोकनं ध्यानं रामं हृदि निधाय च। अङ्गादिभूषणैः सार्द्धं बाहुना चरणैरपि ।।23।। सभी अंगों, भूषणों, बाहुओं और चरणों सहित श्रीराम को हृदय में धारण कर उन्हें भली भाँति देखना ध्यान है। सत्यज्ञानसुखैकत्वप्राप्तये प्राप्तिसाधनम्। समाधिर्धर्मचिन्ता स्याद् भवान्तरशतेष्वपि ।।24।। समाधिरथवा जीवब्रह्मणोरैक्यचिन्तनम्। ब्रह्मीभूय स्वयं जीवो निरुद्धासुर्विलीनभूः ।।25।। सैकड़ों जन्मों में सत्य, ज्ञान और सुख की प्राप्ति के लिए साधन के रूप में धर्म-चिन्तन समाधि है। अथवा जीव और ब्रह्म में एकत्व का चिन्तन करना समाधि है। इस अवस्था में जीव के प्राण अवरुद्ध हो जाते हैं और पृथ्वी का संसार विलीन हो जाता है; वह साधक ब्रह्मस्वरूप हो जाता है। ^1अतोऽप्यनन्यसद्भावात् स्वयमेवावशिष्यते। मुहूर्तावस्थितौ वापि समाधिरथवोच्यते ।। इसके बाद जीव और ब्रह्म की एकात्मकता के कारण केवल ब्रह्म की सत्ता रह जाती है। इस अवस्था में मुहूर्त भर भी रहना समाधि की दूसरी परिभाषा है। एवमष्टाङ्गसम्पन्नो योगयुक्तः सुसंयतः। सूर्यस्य मण्डलं भित्वा याति ब्रह्म सनातनम् ।।26।। इस प्रकार आठो अंगों को नियमपूर्वक पूरा कर योग से संयुक्त योगी होकर सूर्यमण्डल का भेदन कर सनातन ब्रह्म को प्राप्त करते हैं। स एवमभ्यसेन्नित्यं वीतभीः^2 शान्त एव च। वशीकृतरिपुग्रामः^3 सोऽमृतत्वाय कल्पते ।।27।।

  1. क. यह श्लोक अनुपलब्ध। 2. घ. विनीतः। 3. वशीकृतेन्द्रियग्रामः। 4. स याति परमां गतिं।

विंशोऽध्यायः (147) जो प्रति दिन इस प्रकार का अभ्यास करे, वह भयमुक्त तथा शान्त होकर सभी काम-क्रोधादि शत्रुओं को वश में कर अमृतत्व को प्राप्त कर लेता है। निरस्ताशेषदुरितः कामक्रोधादिवर्जितः। एवमभ्यासयोगेन योगी याति परां गतिम् ।।२८ ।। सभी पापों का नाश कर काम, क्रोध आदि का त्याग कर इस प्रकार अभ्यास कर योगी परम गति को प्राप्त करते हैं। कर्मयोगेन वा ज्ञानयोगेनाथोभयेन च। प्राप्यते पुनरावृत्तिरहितं ब्रह्मशाश्वतम् ।।२९ ।। कर्मयोग से, ज्ञान से अथवा दोनों से वह साधक पुनर्जन्म से रहित शाश्वत ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है। करोत्यनुदिनं यस्तु तत्तत्फलगतस्पृहः। जपहोमात्मकं कर्म समुन्नीयत तत्फलम् ।।३०।। सगुणं निर्गुणं चाथ ध्यायेद् यो रघुवंशजम्।¹ कर्मानपेक्षध्यानेन स यात्येव परं पदम् ।।३१ ।। ध्यानेन कर्मणा चैव योऽभ्यसेद्योगमन्वहम्। स यात्येवोत्तमं स्थानं यद् गत्वा न निवर्तते ।।३२।। जो प्रतिदिन कर्मों के फल के प्रति निःस्पृह होकर जप, होम आदि कर्म करते हैं अथवा उस फल को मन में लाकर सगुण अथवा निर्गुण श्रीराम का ध्यान करते हैं, वे कर्म के बिना भी ध्यान से उस उत्तम स्थान को प्राप्त करते हैं, जहाँ जाकर कोई लौटता नहीं। ध्यान अथवा कर्म से जो प्रतिदिन योग का अभ्यास करते हैं, वे उत्तम स्थान को प्राप्त करते हैं, जहाँ पहुँच जाने पर पुनः कोई लौटता नहीं। अतः² सुतीक्ष्ण यत्नेन योगी भव तपोनिधे। व्रतोपवासनियमैः जन्मकोटिष्वनुष्ठितैः ।। ३३ ।। यज्ञैश्च विविधैः सम्यक् भक्तिर्भवति राघवे। संसारसागरस्यास्य पारं प्राप्तुं यदीच्छसि ।। ३४ ।। कर्मयोगेऽथवा ज्ञानयोगे प्रविश सत्वरम्।

  1. घ. रघुनन्दनम्। 2. घ. ततः।

(148) अगस्त्य-संहिता हे सुतीक्ष्ण! इसलिए योगी बनो। करोड़ो जन्मों में व्रत, उपवास आदि नियमों से तथा अनेक प्रकार के यज्ञों से श्रीराम में सम्यक् भक्ति का उदय होता है। इस संसार के समुद्र को यदि पार करना चाहते हो, तो कर्मयोग में अथवा ज्ञानयोग में शीघ्रता से प्रवेश करो। सर्वदुःखाभिभूतानां भ्रान्तानां गतचेतसाम् ।। ३५ ।। त्राता स एव संसारे राघवः स्वयमेव हि। सभी प्रकार के दुःखों से दुःखी, भटके हुए तथा चैतन्यहीन प्राणियों की रक्षा करनेवाले स्वयं श्रीराम है। प्रक्षीणशेषपापानां ज्ञानयोगः प्रशस्यते ।। ३६ ।। कर्मयोगैस्तु सर्वेषां भवे निर्वाणसाधनम्। जिनके सभी पाप नष्ट हो गये हैं, उनके लिए ज्ञान योग प्रशस्त हैं; किन्तु इस संसार में सबके लिए कर्मयोग के द्वारा मुक्ति का साधन मिल जाता है। ज्ञानेन कर्मणा वापि रामं सम्यगिहार्चयेत् ।। ३७ ।। सुतीक्ष्णैतच्छरीरं तु क्षयिष्ण्वपि पतिष्णु च। १। त्वगसृङ्मांसमज्जास्थिमेदश्शुक्रमयं तनुः ।। ३८ ।। शास्त्रोपपादितं सम्यगनुतिष्ठ सनातनम्। ज्ञान से अथवा कर्म से इस संसार में श्रीराम की सम्यक् आराधना करनी चाहिए। हे सुतीक्ष्ण! यह शरीर विनाशशील है और संयमित करने योग्य है। त्वचा, रक्त, मांस, मज्जा, अस्थि, मेद और शुक्र से बना हुआ यह शरीर है इसलिए शास्त्रों में प्राचीन काल से जो विधान किया गया है, उसका पालन करो। कर्मयोगं तथा ज्ञानयोगं वा योगवित्तम ।। ३९ ।। श्वः करिष्यामि कर्त्तव्यमिति कश्चिद् विचिन्तयेद्। स्वस्यास्ये स्वयमेवार्य्य मन्दाक्षो धूलिं निक्षिपेत् ।। ४० ।। हे योग के ज्ञाताओं में श्रेष्ठ सुतीक्ष्ण! हे आर्य! 'कर्मयोग अथवा ज्ञानयोग मैं कल करूँगा' यह जो कोई सोचता है, वह अन्धा जैसा अपने मुँह पर धूल झोंक रहा है। सम्यग्वैराग्यनिष्ठस्य पारतत्त्वस्थचेतसः। छर्दितान्ननिभाः सर्वे दृश्यन्ते विषयाः स्वयम् ।। ४१

  1. घ. क्षयिष्णु पिपतिष्णु च।