अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 199, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ें(138) अगस्त्य-संहिता अहो स्वजनभाग्यस्य यथावत्तत् क्षयं भवेत्।।34।। अतो ब्रह्मविदां द्वेषो न कर्त्तव्यः शुभेच्छुभिः²। निन्दा चैव न कर्त्तव्या हितमेव समाचरेत्।।।35।। अपने कुटुम्बों के भाग्य की तरह उनका भी ह्रास होता है। अतः जो अपनी भलाई चाहते हों, वे ब्रह्मज्ञानियों से द्वेष न करें, उनकी निन्दा न करें; केवल भलाई का कार्य करें। ये स्तुवन्त्यनुमोदन्ति ददत्यस्मै मनीषिणः। तत्पुण्यमखिलं लब्ध्वा तद्गतिं प्राप्नुवन्त्यपि।।36।। जो उनकी स्तुति करते हैं; उनका समर्थन करते हैं, उन्हें दान देते हैं वे बुद्धिमान् व्यक्ति अपने सभी कर्मों से उनके पुण्यों को पाकर उनकी गति को भी प्राप्त करते हैं। ज्ञात्वा तमेवमात्मानं कृत्यं कुरु निरन्तरम्। एतेनैव तवाभीष्टं भविष्यति न संशयः।।37।। उसी आत्मा को जानकर लगातार कर्म करो। इसी से तुम्हारा अभीष्ट सिद्ध होगा, इसमें सन्देह नहीं। त्यज¹ दुर्जनगोष्ठीषु विहारेच्छां समाचर। हितमेव सतां नित्यमहिंसातत्परो भव।।38।। दुर्जनों की गोष्ठी में स्वच्छन्द होकर रंगरेलियाँ मनाने की इच्छा न करो; प्रतिदिन सज्जनों के कल्याण की बात करो और अहिंसा के लिए कमर कस लो। तत्प्राप्तिसाधनान्यष्टौ तानि वक्ष्यामि तच्छृणु। यमो नियमसंज्ञश्च आसनं च तृतीयकम्।।39।। प्राणायामश्चतुर्थश्च प्रत्याहारश्च पञ्चमः। धारणा च तथा ध्यानं समाधिरिति सत्तम।।40।। हे सत्तम! उस श्रीराम को पाने के आठ साधन हैं, जिन्हें सुनो- यम, नियम और तीसरा आसन, चौथा प्राणायाम, पाँचवाँ प्रत्याहार इसके बाद धारणा, ध्यान और समाधि।
- घ. त्यजन्।