भारतकोश
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

पृष्ठ 200, कुल 337 में से

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पृष्ठ 200

_ _ _ _ _ _ _ _ _ एकोनविंशोऽध्यायः _ _ _ _ _(139) प्रत्येकमेषां वक्ष्यामि लक्षणानि च सुव्रत। तद्विविच्य प्रवक्ष्यामि तत्तल्लक्षणमप्यहो।।41।। हे सुव्रत! इनके प्रत्येक का लक्षण मैं कहूँगा फिर उनका विवेचन कर उनका लक्षण कहूँगा। अहिंसा सत्यमस्तेयं ब्रह्मचर्यं दयार्जवम्। क्षमा धृतिर्मिताहारः शौचं चेति यमाः दश।।42।। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, दया, कोमलता, क्षमा, धैर्य, मिताहार, शौच ये दश यम हैं। सर्वेषामपि जन्तूनामक्लेशजननं पुनः। वाङ्मनः कर्मभिर्नूनमहिंसेत्यभिधीयते।।43।। सभी प्राणियों को वचन, मन एवं कर्म से कष्ट न पहुँचाना अहिंसा कही जाती है। यथादृष्टश्रुतार्थानां स्वरूपकथनं पुनः। सत्यमित्युच्यते धीरैस्तद् ब्रह्मप्राप्तिसाधकम्।।44।। जैसा देखा गया हो और सुना गया हो, उसी रूप में यदि पुनः कहा जाये तो उसे धीरों ने सत्य कहा है, यह सत्य ब्रह्म की प्राप्ति का साधक है। तृणादेरप्यनादानं परस्य चेत् तपोधन। अस्तेयमेतदप्यङ्ग ब्रह्मप्राप्तेः सनातनम्।।45।। हे अंग! सुतीक्ष्ण! दूसरे का घास तक नहीं लेना अस्तेय है, जो ब्रह्म की प्राप्ति का सनातन साधन है। अवस्थास्वपि सर्वासु कर्मणा मनसा गिरा।¹ स्त्रीसंगतिपरित्यागो ब्रह्मचर्यं प्रशिक्षते।।46।। सभी अवस्थाओं में कर्म, मन एवं वचन से स्त्री की संगति का परित्याग ब्रह्मचर्य कहलाता है। परेषां दुःखमालोक्य स्वस्येवालोच्य तस्य तु। उत्सादानानुसंधानं दयेति प्रोच्यते बुधैः।।47।।

  1. घ. मनसापि वा।