भारतकोश
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

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(140) अगस्त्य-संहिता दूसरों का दुःख देखकर 'यह दुःख मेरा है' ऐसा समझकर उसे हटाने हेतु जो चिन्तन किया जाये, उसे बुद्धिमान् दया कहते हैं। व्यवहारेषु सर्वेषु मनोवाक्कायकर्मभिः। सर्वेषामपि कौटिल्यराहित्यं त्वार्जवं भवेत् ।।48।। सभी प्रकार के व्यवहारों में मन, वचन एवं कर्म से सबके प्रति कुटिलता का त्याग करना कोमलता है, वह लाना चाहिए। सर्वात्मना सर्वदापि सर्वत्राप्यपकारिषु। बन्धुष्विव समाचारः क्षमा स्याद् ब्रह्मवित्तम ।।49।। हे ब्रह्मज्ञानियों में श्रेष्ठ! हर प्रकार से, हमेशा, हर स्थान पर अपकार करनेवालों के प्रति भी भाई-बन्धु के समान आचरण करना क्षमा है। इच्छाप्रयत्नराहित्यं यातेषु विषयेष्वपि। नो भवेत् तां धृतिं धीराः प्रवदन्ति सतां वरः ।।50।। बीती हुई बातों के सम्बन्ध में इच्छा और उसके लिए प्रयत्न न करना धृति कहलाता है ऐसा धीर लोग कहते हैं। भोज्यस्यैव चतुर्थांशं भोजनं स्वस्थचेतसः। अत्युष्णकटुतिक्ताम्ललवणादिविवर्जितम्¹ ।।51।। हितं मेध्यं सुतीक्ष्णैतन्मिताहारं प्रवक्ष्यते। जितना भोजन कर सकते हों, उसका चौथाई भाग ही भोजन है। वह अधिक गरम, कड़वा, तीता, खट्टा, नमकीन नहीं होना चाहिए। भोजन हितकर हो और पवित्र हो। वैसा भोजन करना मिताहार कहलाता है। निर्गतं रोमकूपेभ्यो नवरन्ध्रेभ्य एव च ।।52।। मलं वदन्ति द्वाराणां क्षालनं शौचमुच्यते। मृज्जलाभ्यां बहिः सम्यक् निर्मलीकरणं पुनः ।।53।। पूर्वोक्तभूतशुद्धान्तं शौचमाचक्षते बुधाः। एते दश यमाः ब्रह्मन् ब्रह्मसम्प्राप्ति हेतवः ।।54।। शरीर के नौ छिद्र एवं रोमकूपों से निकले हुए पदार्थ को मल कहते हैं। इनके द्वारों को प्रक्षालित करना शौच कहा जाता है। मिट्टी और जल से शरीर के

  1. घ. अत्युष्णकटुताम्बूललवणादिविवर्जितम्। 2. घ. सिद्धान्तलक्षणम्।