अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 202, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ेंएकोनविंशोऽध्यायः (141)
बाहरी अंगों का शुद्धीकरण होता है तथा पूर्वोक्त विधि से भूतशुद्धि पर्यन्त शुद्धि को बुद्धिमान् लोग शौच कहते हैं। हे ब्रह्मन्! ये दश यम हैं, जो ब्रह्म-प्राप्ति के साधन हैं। तपश्च तुष्टिरास्तिक्यं ईश्वराराधनं तथा। सिद्धान्तावेक्षणं² चैव लज्जा दानं मतिस्तथा।।55।। जपो व्रतं दशैतानि सुतीक्ष्ण नियमाः स्मृताः। तप, तुष्टि, आस्तिक्य भावना, ईश्वर की आराधना, सिद्धान्तों का अवलोकन करना, लज्जा, दान, मति, जप और व्रत ये दश नियम कहे गये हैं। प्रत्येकमेषां वक्ष्यामि लक्षणानि तपोनिधे।।56।। तपस्त्वनशनं नाम विधिपूर्वकमिष्यते। अनायासोपवासेन तृप्त्यर्थं¹ नैव जीवनम्।।57।। तुष्टिरेषावधार्य्यैतत् तत्प्राप्तिर्नानया विना। श्रुत्याद्युक्तेषु विश्वास आस्तिक्यं स प्रचक्षते।।58।। हे तपोनिधि सुतीक्ष्ण! इनमें से अब प्रत्येक का लक्षण कहता हूँ। विधानपूर्वक और विना प्रयास किये हुए भोजन नहीं करना तप कहलाता है। 'मेरा जीवन तृप्ति के लिए नहीं है' तथा 'जीवन तृप्ति के बिना भी व्यर्थ नहीं है' यह धारणा बनाकर रहना तुष्टि है। वेदादि शास्त्रों में उक्त सिद्धान्तों पर विश्वास करना आस्तिक्य है। इष्टदेवार्चनं सम्यक् विधिपूर्वकमन्वहम्। त्रिसन्ध्यमेकवारन्तु भवत्येवेश्वरार्चनम्।।59।। प्रतिदिन तीनों सन्ध्या में अथवा एक बार प्रातःकाल में विधानपूर्वक अपने इष्टदेव की आराधना ईश्वर की आराधना है। वैष्णवागमसिद्धान्तश्रवणं मननं तथा। श्रुतिस्मृतिपुराणादिमध्यान्तोदर्कदर्शनम् ।।60।। सिद्धान्तश्रवणं ह्येतत् प्रोच्यते तत्त्वदर्शिभिः। वैष्णवागम के सिद्धान्त का श्रवण, मनन, वेद, स्मृति, पुराण आदि के श्रवण के मध्य तथा अन्त में उसके परिणाम के भी दर्शन को तत्त्वज्ञानियों ने सिद्धान्त-श्रवण कहा है।
- घ. तृप्त्युत्पत्त्यैव जीवनम्।