भारतकोश
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

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पृष्ठ 203

(142) अगस्त्य-संहिता — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — श्रुत्यादिभिर्लौकिकैश्च यद्यदत्यन्तनिन्दितम्।।61।। तत्राप्रवर्तनं लज्जा वाङ्मनःकर्मणामपि। वेद या लोक में जो अत्यन्त निन्दित कर्म माना गया हो, उन कार्यों को को नहीं करना वाणी, मन और कर्मों की लज्जा है। यदिष्टदेवतां ध्यात्वा तदर्पणधियान्वहम्।।62।। सत्पात्रे दीयतेन्नादि^1 तद्दानमभिधीयते। अपने इष्टदेव का ध्यान कर उन्हें समर्पित करने की बुद्धि से प्रतिदिन जो अन्नादि दिया जाता है, उसे दान कहते हैं। तर्कैस्तदनुसन्धानं^2 सम्यक् सदसतोरपि।।63।। शास्त्रोक्तयोर्मतिरयं तत्त्वविद्भिरुदीर्यते। तर्क कर शास्त्र में उक्त अच्छे और बुरे का अनुसंधान कर तत्त्व-ज्ञान तत्त्वज्ञानियों के द्वारा मति कही गयी है। गुरोर्लब्धस्य मन्त्रस्य शश्वदावर्त्तनं हि यत्।।64।। अन्तरङ्गाक्षराणां च न्यासपूर्वो जपो भवेत्। न्यास करके करना गुरु से प्राप्त मन्त्र के अन्तर्गत आये अक्षरों की बार बार आवृत्ति जप कहलाता है। कर्तव्यस्य समस्तस्य नियमग्रहणं व्रतम्।।65।। सभी कर्तव्यों को नियमपूर्वक स्वीकार करना व्रत कहलाता है। नियमव्यतिरेकेण सर्वं भवति निष्फलम्। अतो नियमतः सर्वं कृत्यं साफल्यमाप्नुयात्।^3।।66।। नियम के विपरीत सभी कार्य निष्फल हो जाते हैं, अतः नियमपूर्वक सभी कृत कर सफलता पायें। इत्यगस्त्यसंहितायां परमरहस्ये यमनियमव्रतो नाम एकोनविंशोऽध्यायः।


  1. घ. दीयतेऽर्थादि। 2. घ. स्वतस्तदनुसंधानम्। 3. घ. यमैश्च नियमैश्चैव कृतं यत् सफलं भवेत्। Rarest Archiver