अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविंशोऽध्यायः (143) अथ विंशोऽध्यायः अगस्त्य उवाच एकत्रैव स्थिरीभावः पूर्वोक्तनियमैः सह। मूलार्पितशरीरस्य एतदासनमुच्यते।।1।। पूर्वोक्त नियमों का पालन करते हुए मूलाधार में अर्पित शरीर का एक स्थान पर स्थिर रहना आसन कहलाता है। प्राणायामाँस्तथा वक्ष्ये मुमुक्षोरुपकारकान्। यैः कृतैर्दह्यतेऽघौघः शुष्केन्धनगिरिर्मुने।।2।। अब मोक्ष चाहनेवालों के उपकारक प्राणायामों के विषय में कहता हूँ, जिन्हें करने से पाप समूह रूपी सूखी लकड़ी का पहाड़ भस्म हो जाता है। इन्द्रियेष्वपि ये दोषा वातपित्तकफोद्भवाः। त्वगसृङ्मांसमेदोत्थाः मज्जास्थिचर्मसम्भवाः। 1 ।।3।। एतेऽपि सर्वे दह्यन्ते प्राणस्यान्तर्निरोधनात्। प्रायश्चित्तमघौघानां मुख्यमेतद् वदन्ति हि।।4।। वात, पित्त एवं कफ के कारण त्वचा, रक्त, मांस, मेद, मज्जा, अस्थि एवं चर्म में उत्पन्न जो इन्द्रियों में दोष हैं, वे भी प्राणवायु को अन्तः में रोकने से जल जाते हैं। पाप समूह का भी यह मुख्य प्रायश्चित्त कहा गया है। पुनरावृत्तिरहितं शाश्वतं ब्रह्मकांक्षिभिः। प्राणायामश्च सततं कर्तव्यो विधिवन्मुने।।5।। पुनर्जन्म से रहित तथा शाश्वत पद एवं ब्रह्म का साक्षात्कार करने की इच्छा रखनेवालों के द्वारा विधानपूर्वक प्राणायाम सदा करना चाहिए। सम्यङ्निरुध्य च प्राणानन्तःकरणमात्मनि। स्वयमेवात्र शिष्टः सन् ब्रह्मभूयाय कल्पते।।6।। प्राणवायु को सम्यक् रूप से रोककर आत्मा में अन्तःकरण को प्रविष्ट कराकर स्वयं को इस स्थिति में तटस्थ रखकर साधक ब्रह्म स्वरूप हो जाता है।
- घ. त्वगसृङ्मांसमेदोऽस्थिमज्जान्त्रशुक्रसम्भवाः।