अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 205, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ें(144) अगस्त्य-संहिता जानुबिम्बं कराग्रेण त्रिः परामृश्य सत्त्वरम्। प्रदद्याच्छोटिकामेकामियं मात्रा कनीयसी ।।7।। मध्यमा द्विगुणा चैव सा ज्येष्ठा त्रिगुणा स्मृता। अधमो मध्यमश्चैव प्राणायामस्तथोत्तमः ।।9।। जानुमण्डल के ऊपर हथेली को शीघ्रतापूर्वक तीन बार फिराकर एक बार चुटकी बजाने में जो समय लगता है, उसे छोटी मात्रा कहते हैं। इसी दुगुनी मात्रा मध्यमा कहलाती है और तीन गुनी श्रेष्ठ मात्रा कहलाती है। इसी प्रकार प्राणायाम भी अधम, मध्यम और उत्तम भेद से प्राणायाम तीन प्रकार के होते हैं। अधमः पञ्चदशभिः त्रिंशद्भिर्मध्यमो भवेत्। मात्राभिरुत्तमः पञ्चचत्वारिंशद्भिरुच्यते ।।10।। प्राणायामैः कृतै शश्वत् कृतैः षोडशभिर्मुने। दिने दिने च च यत्पापं तत्सर्वं नश्यति ध्रुवम् ।।11।। परोपतापजं पापं परद्रव्यापहारजम्। परस्त्रीमैथुनोत्पन्नं प्राणायामैः शतं दहेत् ।।12।। पन्द्रह मात्राओं से अधम, तीस मात्राओं का मध्यम तथा पैंतालीस मात्राओं का उत्तम प्राणायाम है। नियमित रूप से सोलह बार प्राणायाम कर प्रतिदिन के पाप को नाश कर लेता है। दूसरे को कष्ट देने से, दूसरे का धन छीनने से, परायी स्त्री से मैथुन करने से जो पाप होते हैं, वे सौ बार प्राणायामों से जल जाते हैं। महापातकजातानि ब्रह्महत्याशतानि च। सर्वाण्यपि प्रदह्यन्ते प्राणायामैश्चतुःशतैः ।।13।। महापातकों का समूह तथा सैकड़ो ब्रह्महत्या का पाप, ये सभी चार सौ प्राणायाम से जल जाते हैं। आदावन्ते च यत्नेन प्राणायामं समाचरेत्। कर्मस्वपि समस्तेषु शुभेष्वप्यशुभेषु च।।14।। सभी शुभ एवं अशुभ कर्म के प्रारम्भ और अन्त में यत्नपूर्वक प्राणायाम करना चाहिए।
- घ. ०विधिवन्मुने।