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अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

पृष्ठ 206, कुल 337 में से

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पृष्ठ 206

विंशोऽध्यायः (145) प्राणायामैर्विना यद्यत् कृतं कर्म निरर्थकम्। अतो यत्नेन कर्तव्या प्राणायामाः शुभार्थिना।।15।। प्राणायाम के विना जो जो कर्म किए जाते हैं, वे व्यर्थ हो जाते हैं। अतः शुभ चाहनेवाले यत्नपूर्वक प्राणायाम करें। यावच्छक्यं नियम्यासून मनसैव जपेन्मनुम्। रामं मुहुर्मुहुर्ध्यायन् पूर्वोक्तविधिवत्सुधीः¹।।16।। जबतक सम्भव हो प्राणवायु को रोककर श्रीराम का ध्यान करते हुए मन ही मन मन्त्र पूर्वोक्त विधि से जप करें। ¹धारयन्नन्तरं वासून नेत्रे किञ्चिन्निमील्य च। परं ज्योतिः परं ध्यायन्नन्तरेव मनुर्जपेत्।।17।। अथवा प्राणवायु को भीतर में धारण कर दोनों आँखें थोड़ा बन्द कर परम ज्योतिःस्वरूप परमात्मा का ध्यान करते हुए मन ही मन मन्त्र का जप करें। आपादमस्तकं सम्यक् प्रविशत्यनिलो यथा। यावतीभिस्तुमात्राभिरिन्द्रियाण्यपि धावतः।।18।। प्रक्षुभ्यति शरीरं च तावन्मात्रं सुसंयमः। जितनी मात्राओं के बराबर समय में मस्तक से पैर तक तथा सभी इन्द्रियों तक जैसे वायु प्रविष्ट हो रहा हो तथा शरीर हिलने लगे, उतनी मात्राओं तक प्राणायाम करना चाहिए। प्राणायामैर्विना यस्य जपहोमार्चनादिकाः।।19।। न फलन्त्येव ताः सर्वाः यत्नेनापि कृताः क्रियाः। प्राणायाम के विना जप, होम, अर्चन आदि क्रियाएँ करते हैं, वे सफल नहीं होते हैं; चाहे वे क्रियाएँ यत्न से क्यों न किये जाएँ। इन्द्रियाणां हृदा सार्द्धं विषयेभ्यो निवर्तनम्।।20।। प्रत्याहारो भवेदेतत् सम्यगिन्द्रियनिग्रहः। इन्द्रियों को अपने अपने विषयों से विमुख करनेवाला तथा हृदय के साथ संयोग करानेवाला प्रत्याहार है; इससे सम्यक् प्रकार से इन्द्रिय-निग्रह होता है।

  1. घ. यहाँ से छह चरण अनुपलब्ध।
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