अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ
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(146) अगस्त्य-संहिता
जीवस्य ब्रह्मरूपेण निर्द्धारो वाथ युक्तिभिः ।।21।। पूर्वोक्ता या तु मात्राख्या प्राणायामत्रयोद्भवा। आत्मन्यपि स्थिरीकारश्चित्तस्येवात्र धारणा ।।22।। जीव को ब्रह्म के रूप में युक्तियों के द्वारा निर्धारित करना धारणा है अथवा पूर्व में कही गयी मात्रा से तीन बार प्राणायाम कर आत्मा में चित्त को स्थिर करना धारणा है। सम्यगालोकनं ध्यानं रामं हृदि निधाय च। अङ्गादिभूषणैः सार्द्धं बाहुना चरणैरपि ।।23।। सभी अंगों, भूषणों, बाहुओं और चरणों सहित श्रीराम को हृदय में धारण कर उन्हें भली भाँति देखना ध्यान है। सत्यज्ञानसुखैकत्वप्राप्तये प्राप्तिसाधनम्। समाधिर्धर्मचिन्ता स्याद् भवान्तरशतेष्वपि ।।24।। समाधिरथवा जीवब्रह्मणोरैक्यचिन्तनम्। ब्रह्मीभूय स्वयं जीवो निरुद्धासुर्विलीनभूः ।।25।। सैकड़ों जन्मों में सत्य, ज्ञान और सुख की प्राप्ति के लिए साधन के रूप में धर्म-चिन्तन समाधि है। अथवा जीव और ब्रह्म में एकत्व का चिन्तन करना समाधि है। इस अवस्था में जीव के प्राण अवरुद्ध हो जाते हैं और पृथ्वी का संसार विलीन हो जाता है; वह साधक ब्रह्मस्वरूप हो जाता है। ^1अतोऽप्यनन्यसद्भावात् स्वयमेवावशिष्यते। मुहूर्तावस्थितौ वापि समाधिरथवोच्यते ।। इसके बाद जीव और ब्रह्म की एकात्मकता के कारण केवल ब्रह्म की सत्ता रह जाती है। इस अवस्था में मुहूर्त भर भी रहना समाधि की दूसरी परिभाषा है। एवमष्टाङ्गसम्पन्नो योगयुक्तः सुसंयतः। सूर्यस्य मण्डलं भित्वा याति ब्रह्म सनातनम् ।।26।। इस प्रकार आठो अंगों को नियमपूर्वक पूरा कर योग से संयुक्त योगी होकर सूर्यमण्डल का भेदन कर सनातन ब्रह्म को प्राप्त करते हैं। स एवमभ्यसेन्नित्यं वीतभीः^2 शान्त एव च। वशीकृतरिपुग्रामः^3 सोऽमृतत्वाय कल्पते ।।27।।
- क. यह श्लोक अनुपलब्ध। 2. घ. विनीतः। 3. वशीकृतेन्द्रियग्रामः। 4. स याति परमां गतिं।