अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 208, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ेंविंशोऽध्यायः (147) जो प्रति दिन इस प्रकार का अभ्यास करे, वह भयमुक्त तथा शान्त होकर सभी काम-क्रोधादि शत्रुओं को वश में कर अमृतत्व को प्राप्त कर लेता है। निरस्ताशेषदुरितः कामक्रोधादिवर्जितः। एवमभ्यासयोगेन योगी याति परां गतिम् ।।२८ ।। सभी पापों का नाश कर काम, क्रोध आदि का त्याग कर इस प्रकार अभ्यास कर योगी परम गति को प्राप्त करते हैं। कर्मयोगेन वा ज्ञानयोगेनाथोभयेन च। प्राप्यते पुनरावृत्तिरहितं ब्रह्मशाश्वतम् ।।२९ ।। कर्मयोग से, ज्ञान से अथवा दोनों से वह साधक पुनर्जन्म से रहित शाश्वत ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है। करोत्यनुदिनं यस्तु तत्तत्फलगतस्पृहः। जपहोमात्मकं कर्म समुन्नीयत तत्फलम् ।।३०।। सगुणं निर्गुणं चाथ ध्यायेद् यो रघुवंशजम्।¹ कर्मानपेक्षध्यानेन स यात्येव परं पदम् ।।३१ ।। ध्यानेन कर्मणा चैव योऽभ्यसेद्योगमन्वहम्। स यात्येवोत्तमं स्थानं यद् गत्वा न निवर्तते ।।३२।। जो प्रतिदिन कर्मों के फल के प्रति निःस्पृह होकर जप, होम आदि कर्म करते हैं अथवा उस फल को मन में लाकर सगुण अथवा निर्गुण श्रीराम का ध्यान करते हैं, वे कर्म के बिना भी ध्यान से उस उत्तम स्थान को प्राप्त करते हैं, जहाँ जाकर कोई लौटता नहीं। ध्यान अथवा कर्म से जो प्रतिदिन योग का अभ्यास करते हैं, वे उत्तम स्थान को प्राप्त करते हैं, जहाँ पहुँच जाने पर पुनः कोई लौटता नहीं। अतः² सुतीक्ष्ण यत्नेन योगी भव तपोनिधे। व्रतोपवासनियमैः जन्मकोटिष्वनुष्ठितैः ।। ३३ ।। यज्ञैश्च विविधैः सम्यक् भक्तिर्भवति राघवे। संसारसागरस्यास्य पारं प्राप्तुं यदीच्छसि ।। ३४ ।। कर्मयोगेऽथवा ज्ञानयोगे प्रविश सत्वरम्।
- घ. रघुनन्दनम्। 2. घ. ततः।