अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ
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(148) अगस्त्य-संहिता हे सुतीक्ष्ण! इसलिए योगी बनो। करोड़ो जन्मों में व्रत, उपवास आदि नियमों से तथा अनेक प्रकार के यज्ञों से श्रीराम में सम्यक् भक्ति का उदय होता है। इस संसार के समुद्र को यदि पार करना चाहते हो, तो कर्मयोग में अथवा ज्ञानयोग में शीघ्रता से प्रवेश करो। सर्वदुःखाभिभूतानां भ्रान्तानां गतचेतसाम् ।। ३५ ।। त्राता स एव संसारे राघवः स्वयमेव हि। सभी प्रकार के दुःखों से दुःखी, भटके हुए तथा चैतन्यहीन प्राणियों की रक्षा करनेवाले स्वयं श्रीराम है। प्रक्षीणशेषपापानां ज्ञानयोगः प्रशस्यते ।। ३६ ।। कर्मयोगैस्तु सर्वेषां भवे निर्वाणसाधनम्। जिनके सभी पाप नष्ट हो गये हैं, उनके लिए ज्ञान योग प्रशस्त हैं; किन्तु इस संसार में सबके लिए कर्मयोग के द्वारा मुक्ति का साधन मिल जाता है। ज्ञानेन कर्मणा वापि रामं सम्यगिहार्चयेत् ।। ३७ ।। सुतीक्ष्णैतच्छरीरं तु क्षयिष्ण्वपि पतिष्णु च। १। त्वगसृङ्मांसमज्जास्थिमेदश्शुक्रमयं तनुः ।। ३८ ।। शास्त्रोपपादितं सम्यगनुतिष्ठ सनातनम्। ज्ञान से अथवा कर्म से इस संसार में श्रीराम की सम्यक् आराधना करनी चाहिए। हे सुतीक्ष्ण! यह शरीर विनाशशील है और संयमित करने योग्य है। त्वचा, रक्त, मांस, मज्जा, अस्थि, मेद और शुक्र से बना हुआ यह शरीर है इसलिए शास्त्रों में प्राचीन काल से जो विधान किया गया है, उसका पालन करो। कर्मयोगं तथा ज्ञानयोगं वा योगवित्तम ।। ३९ ।। श्वः करिष्यामि कर्त्तव्यमिति कश्चिद् विचिन्तयेद्। स्वस्यास्ये स्वयमेवार्य्य मन्दाक्षो धूलिं निक्षिपेत् ।। ४० ।। हे योग के ज्ञाताओं में श्रेष्ठ सुतीक्ष्ण! हे आर्य! 'कर्मयोग अथवा ज्ञानयोग मैं कल करूँगा' यह जो कोई सोचता है, वह अन्धा जैसा अपने मुँह पर धूल झोंक रहा है। सम्यग्वैराग्यनिष्ठस्य पारतत्त्वस्थचेतसः। छर्दितान्ननिभाः सर्वे दृश्यन्ते विषयाः स्वयम् ।। ४१
- घ. क्षयिष्णु पिपतिष्णु च।