अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकविंशोऽध्यायः (149)
शरीरित्वमपि प्रायो विरक्तस्यैव शोभते। विरक्तस्य तदा स्यात्तु त्याज्यं सर्वात्मना भवेत् ।।42।। सम्यक् प्रकार से वैराग्य युक्त साधक जो परम तत्त्व में ध्यान लगाये हुए हैं, उन्हें सारे विषय वमन किये हुए पदार्थ के समान स्वयं दिखाई पड़ने लगते हैं। इस शरीर की भावना भी विरक्त को ही शोभा देती है। विरक्त के लिए यह शरीर भी शीघ्र ही हर प्रकार से त्याज्य है। अत्यमेध्यशरीरस्थं विष्ठामध्यगतादपि। तत्त्वनिष्ठो विशेषेण प्राणिनां मनुते हितम् ।।43।। शरीरेऽस्मिन्नमेध्यत्वमीदृशं नाम देहिनाम्। त्वगाद्येकैकसंस्पर्शे स्नानमेव विशोधनम् ।।44।। अत्यन्त अपवित्र शरीर में स्थित इन्द्रिय विष्ठा के बीच रहनेवाले कीड़े के समान हैं, इस शरीर को तत्त्वज्ञानी विशेष रूप से प्राणियों का केवल उपकारक मानते हैं। प्राणियों में इस शरीर की ऐसी अपवित्रता होती है, अतः त्वचा आदि प्रत्येक का स्पर्श होने पर उसकी शुद्धि स्नान है। शृगालैरपि गृध्रैश्च नीयते यद्यहो विधिः। विधत्ते चर्मणा चैव शरीराणि शरीरिणाम् ।।45।। तत्तु प्रतिपदं सम्यगापदां पदमीदृशम्। ततः शरीरं विश्वस्य न उदास्ते स मूढधीः ।।46।। सियार और गीध उस शरीर के टुकड़े टुकड़े कर ले जाते हैं, यही विधि का विधान है। वे ही अवयव शरीरधारियों में चमड़ा से ढँके हुए रहते हैं। वह शरीर प्रत्येक पग पर विपत्तियों का स्थान है, अतः जो शरीर पर विश्वास करते हुए शरीर से उदासीन नहीं रहते हैं, वे विद्वान् नहीं, मूर्ख हैं। दुःखानुभवार्थाय विधिनैतत्कृतं वपुः। परमार्थविद्येतद् वीक्षमाणो न वीक्षते।।47।। व्यामोहिते जगत्यस्मिन् माययैव महात्मनः। विष्णोस्तत्त्वविदप्याशु देहान्तरमुपैत्यहो ।।48।। सुखबुद्ध्या दुःखमेव भूयोप्यनुभवेत् तु यः। Rarest Archiver