भारतकोश
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

पृष्ठ 211, कुल 337 में से

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पृष्ठ 211

(150) अगस्त्य-संहिता केवल दुःख का अनुभव करने के लिए विधाता ने इस शरीर का निर्माण किया है। परमार्थ के ज्ञानी भी इसे देखते हुए भी नहीं देखते हैं; क्योंकि इस संसार में महान् विष्णु की माया से ही वे व्यामोहित हैं। तत्त्वज्ञानी भी दूसरा शरीर पाकर पुनः मैं सुख भोग रहा हूँ, यह सोचते हुए बार-बार दुःख ही भोगने लगते हैं। पतत्यकिञ्चनो भूत्वा कुटुम्बाभरणाकुलः ।।४९।। भ्रमत्येवातुरो भूत्वा दुःखावर्ते पुनः पुनः। दुःखमित्यविजानाति दुःखं नैव तपोधन ।।५०।। सर्वात्मना परित्याज्ये सर्वेषामपि दुःखदे। प्रविशेत् को भवे मन्दे ततोऽप्यादौ पुनर्हतः ।।५१।। वे अकिंचन होकर परिवार के भरण-पोषण में व्याकुल होते हुए इस संसार-चक्र में कूद पड़ते हैं और आतुर होकर बार-बार इसी दुःख रूपी भँवर में घूमते रहते हैं। यह संसार दुःखमय है, उसे वह जीव पहचान नहीं पाता है और दुःख के स्वरूप को भी नहीं जान पाता है। सभी प्राणियों को दुःख देनेवाले अतः हर प्रकार से त्यागने योग्य इस अभागे संसार में कौन प्रवेश करे! वे मन्दबुद्धि वाले जन्म के समय तो नष्ट होते ही हैं, पुनः मृत्यु के समय भी मारे जाते हैं; क्योंकि वे मुक्ति के लिए जीवन भर उपाय नहीं करते। न किञ्चिदपि कर्मात्र निष्फलं विद्यते मुने। इच्छेत् पुनः प्रवेशाय भवेन्मुक्तोऽपि वध्यते ।।५२।। हे मुनि सुतीक्ष्ण! इस संसार में कोई कर्म निष्फल नहीं होता। तब यदि पुनः इस संसार में प्रवेश की इच्छा की जाती है तो मुक्त भी पुनर्जन्म के बन्धन से बँध जाते हैं। अतो न कर्म कर्त्तव्यं फलार्थित्वेन शूरिभिः। न चेत् पतन्ति संसारे दुःखावर्ते विमोहिताः ।।५३।। यदि कर्तुः फलं तत्तदनपेक्ष्यार्चनादिकम्। ईश्वरोऽपि समुद्धर्त्तुं शक्तो भवति नान्यथा ।।५४।। Rarest Archiver

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