अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकविंशोऽध्यायः (151) अतः फल के प्रयोजन से विद्वानों के द्वारा कोई कर्म नहीं किया जाना चाहिए। अन्यथा, वह इस संसार में दुःख के भँवर में विमूढ़ होकर गिर पड़ते हैं। यदि उन अर्चना आदि से कर्ता को मिलनेवाले फल की अपेक्षा न हो, तो कर्म करना चाहिए। उसे ईश्वर ही उद्धार कर सकते हैं; अन्य प्रकार से उनका उद्धार नहीं हो सकता। इत्यगस्त्यसंहितायां परमरहस्ये प्राणायामविधिर्नाम विंशोऽध्यायः ।।20।। अथ एकविंशोऽध्यायः अगस्त्य उवाच अथातोहं प्रवक्ष्यामि गुह्याद् गुह्यतरं परम्। यदशेषेण दुःखघ्नं तच्छृणुष्व तपोनिधे।।1।। तत्प्राप्तिसाधनेनैव कर्मापीत्यपि चिन्त्यते। कर्मणामीदृशं यस्माद् विहितं सुकृतं तथा।।2।। अगस्त्य बोले- अब मैं अत्यन्त गूढ रहस्य बतलाता हूँ, जिससे सभी दुःख मिट जाते हैं। हे तपस्वी! इसे सुनें। उस परमात्मा की प्राप्ति के साधन के रूप में कर्म भी है, यह चिन्तन किया गया है; कर्म का स्वरूप ही ऐसा है कि यह विहित और अविहित रूप से दो प्रकार के होते हैं। रहस्यमेतत् तन्नास्ति तदस्मन्मुक्तये कथम्। यो यत्र वाधिकारत्वे चोदितस्तादृशो नहि।।3।। रहस्य यह है कि कर्म का सत्ता ही नहीं है, तब वह कैसे हमारी मुक्ति के लिए उपयोगी होगा। जो कर्म जिस विनियोग के लिए कहा गया है, वह उसके अनुरूप नहीं है। जगत्यपि धनं न्यायैरागतं क्व च मे वद। ऋत्विजः कर्मतत्त्वज्ञाः यजमानहितैषिणः।।4।।