अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 213, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ें(152) अगस्त्य-संहिता
अब बतलाएँ कि इस संसार में कर्म के लिए न्यायोपार्जित धन कहाँ से मिलेगा? यज्ञ में कर्म के मर्मज्ञ ऋत्विक् क्या यजमान का उपकार करते हैं? क्व च तिष्ठन्ति मन्त्राश्च नियमाध्यापिता पुनः। अधीतानि यमेनापि सम्यग् वा पाठनं कुतः।।5।। कथमेवंविधं कर्मफलं साधकमिष्यते। फिर नियमपूर्वक पढ़ाये गये मन्त्र कहाँ है? कोई यम का पालन करते हुए पढ़ना भी चाहे, तो सम्यक् रूप से किससे पढ़े? तब इस प्रकार किये गये कर्म भला कैसे इष्टसाधक हो सकेगा? यदर्थसाधकत्वेन यच्च यस्य प्रचोदितम् ।।6।। तत्रैवोक्तं प्रयत्नेन व्यङ्गं चेत् तदसाधनम् ।¹ जो कर्म जिस प्रयोजन के लिए साधन के रूप में कहा गया है, वही कर्म अपने अंग के लोप हो जाने पर असाधन हो जाता है। ( लोक में नियम है- एकदेशविकृतमनन्यवत्। अर्थात् यदि कुत्ते की पूँछ कटी हो, तब भी उसे कुत्ता ही कहेंगे, उसकी संज्ञा नहीं बदलती है, किन्तु कर्म के साथ यह विडम्बना है कि इसका एक अंग भी छुट जाये, तो वह साधन नहीं असाधन हो जाता है।) कर्तुं कारयितुं वापि ब्रह्मा विष्णुमहेश्वरः ।।7।। न शक्नोतीति¹ मे बुद्धिर्विहितं विधिवत् स्वयं। को वान्ये विधिवत् कर्म कृत्वेष्टं साधयेत् फलम्² ।।8।। सभी अंगों के साथ विधिवत् कर्म करने और कराने में तो ब्रह्मा, विष्णु और महेश भी समर्थ नहीं होंगे, यह मेरी बुद्धि कहती है। तब दूसरा कौन है, जो स्वयं विधिवत् कर्म कर अभीष्ट फल पा सकेगा? कर्म कर्ता कृतिश्चैव साधनानि बहून्यपि। एतत्साध्यं फलं तेन सुखी भवति देहवान् ।।9।। कर्ता, कर्म, कृति और अनेक प्रकार के साधनों के द्वारा मनुष्य को कर्मफल मिलता है, जिससे वह सुखी होता है। तेषां न्यूनातिरिक्ताभ्यां अतथा चोदिता सती। विपरीतफलस्यैव³ दात्री स्यात् कृतिरुज्जसा।।10।।
- घ. न शक्तोस्तीति। 2. घ. पुनः।