अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकविंशोऽध्यायः (153) कर्मों में न्यूनता और अधिकता हो जाने के कारण शास्त्रानुसार सम्पन्न न होने से कर्म शीघ्र ही विपरीत फल देने लगता है। निर्मलीकरणं कर्म वदन्ति ह्यपि चेतसः। तत्फलानर्थिभिः सम्यग्विहितं तदनुष्ठितम्।।11।। कर्म के फल की प्राप्ति की कामना न रखनेवाले साधकों द्वारा भलीभाँति जो कर्म किया जाता है, वह चित्त को शुद्ध करने की प्रक्रिया है, ऐसा लोग कहते हैं। योगाभ्यासदशायाञ्च तन्नित्यं कर्म नित्यशः। नैमित्तिकनिमित्तेषु काम्यं नैव समाचरेत् ।।12।। योगाभ्यास करते समय नित्यकर्म प्रतिदिन करना चाहिए और नैमित्तिक के लिए किये जानेवाले कर्म के साथ काम्य कर्म नहीं करना चाहिए। सम्यगुत्पन्नवैराग्यो यदा भवति देहवान्। तदा सर्वं परित्यज्य कर्म मोक्षाय कल्पते।।14।। भलीभाँति वैराग्य हो जाने पर प्राणी जब स्वयं को देहधारी समझता है, अर्थात् आत्मा से भिन्न शरीर का अस्तित्व मानने लगता है, तब वह सभी कर्मों का त्यागकर मोक्ष की इच्छा करने लगता है। योगाभ्यासरततः शान्तो निर्धूताशेषकल्मषः। ब्रह्मविद् ब्रह्म भवति परिव्राडेव नेतरः।।15।। सर्वात्मना परित्यागो नास्त्यन्येषामतस्ततः। योगाभ्यास में लीन होकर सभी पापों को जलाकर शान्तचित्त ब्रह्मज्ञानी परिव्राजक ब्रह्म ही हो जाता है, अन्य नहीं; क्योंकि अन्य लोग हर प्रकार से त्याग नहीं कर पाते हैं, इसलिए वे ब्रह्म को प्राप्त नहीं कर पाते हैं। ब्रह्मचारिगृहारण्यवासिनां योगिनामपि।।16।। सर्वात्मनामृतत्वेन ब्रह्मीभावो यतः परम्।¹ गृहस्थों और वानप्रस्थियों में तथा योगियों में जो ब्रह्मचारी होते हैं, वे सभी प्रकार से अमरत्व से पूर्ण होकर ब्रह्मस्वरूप हो जाते हैं। परित्यक्तात्मदेहादिपत्नीपुत्रादिमानितः ।।17।। स्वं देहमपि योऽमेध्यं विण्मूत्रमपि चिन्तयेत्। यतिरुत्पन्नवैराग्यो ब्रह्मेति ब्रह्मवित्तमः।।18।।
- घ. यतो भवेत्। 2. घ. एक श्लोक अनुपलब्ध।