भारतकोश
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

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पृष्ठ 215

(154) अगस्त्य-संहिता ऐसे व्यक्ति, जो शरीर, पत्नी, पुत्र आदि का अभिमान छोड़ चुके हैं, उनमें से अनन्य ब्रह्मचारी शरीर को अपवित्र मानते हुए उसे विष्ठा और मूत्र के समान सोचें। तब वैराग्य उत्पन्न होने के कारण जो यति हो जाते हैं, वे ब्रह्मज्ञानियों में श्रेष्ठ होकर ब्रह्मस्वरूप हो जाते हैं। २कर्मावकाशलेशोऽपि मोक्षे नास्ति ततो मुने। परमार्थविदो नूनं विरक्तस्य सुचेतसः।। परमार्थ को जाननेवाले, विरक्त एवं निर्मल चित्तवाले मनुष्यों के लिए मोक्षमार्ग में कर्म के लिए थोड़ा सा भी स्थान नहीं है। अमेध्यं दृश्यते सर्वं जगत् स्थावरजङ्गमम्। कश्चित्किमर्थं यत्किञ्चित् कुर्याद् भ्रान्त इवात्मवान्।।19।। यह स्थावर एवं जंगम रूप सम्पूर्ण जगत् ही अपवित्र दिखाई पड़ता है। कोई प्राणी इस जगत् में जो कुछ भी है, उसका प्रयोजन जानकर तथा आत्मा का ज्ञान पाकर भी कोई भ्रमित व्यक्ति के समान कर्म करता है। को वामेध्यं परित्यक्तं पुनरङ्गे विनिक्षिपेत्। विष्ठाशनः शूकरोऽपि न स्वविष्ठाशनो भवेत्।।20।। कौन ऐसा प्राणी है, जो अपवित्र वस्तु का परित्याग कर उसे पुनः अपने शरीर पर डाले! विष्ठा खानेवाला सूअर भी अपनी विष्ठा तो नहीं खाता है! स्वेनासत्त्वेन मुक्तस्य स चिन्तां किं करिष्यति। जगत्यभ्युदयार्थं यद् भवेत् कर्म तथाविधि।।21।। एतत् तत्त्वविदो न्यूनं न भ्रान्तस्य कदाचन। जो अपने असत्त्व रूप शरीर से मुक्त हो चुका है, उसे चिन्ता किस बात की होगी? किन्तु इस संसार में अपनी उन्नति के लिए जो कर्म किये जाते हैं, वे तत्त्वज्ञानियों के लिए न्यून होते हैं न कि भ्रान्त लोगों के लिए। इन्द्रियाणि शरीरं च वर्तन्ते मनसा समम्।।22।। विषयेष्वेव तोयानि स्वतो न्यूनस्थलेष्विव। दुःखमुत्पादयन्त्येव तदानीमायतावपि।23।। इन्द्रियाँ तथा शरीर मन के साथ संयुक्त होकर नीचे विषयों की ओर उसी प्रकार गिरने लगते हैं, जैसे जल हमेशा नीचे की ओर बहता है। ऐसी स्थिति में स्फीत स्थल में भी वे इन्द्रियाँ तथा शरीर दुःख ही उत्पन्न करते हैं।

  1. घ. दुःखकृद्।