अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकविंशोऽध्यायः (155) यो यस्य पापकृद्¹ वैरी स तस्येति स्थितिर्भवेत्। तदन्ते वैरिणं ज्ञात्वा समीपेऽप्यपकारिणम् ॥ २४ ॥ स तेनैव हतो भूत्वा प्राणानपि विमुञ्चति । जो शत्रु है और पाप देनेवाला है, उसे लोग अपना (हित) बना लेते हैं, यही विडम्बना की स्थिति है। किन्तु देहान्त के समय में प्राणी समीप में स्थित अपकार करनेवाले शत्रु को जानकर भी उसी के द्वारा घायल होकर अपना प्राण भी त्याग कर देता है। अतो यत्नेन देहादीन् कृच्छ्रचान्द्रायणादिभिः ।। २५ ।। शोधयेद् विधिवत् सम्यक् न च तैरभिभूयते । अतः यत्नपूर्वक देह आदि को कृच्छ्र एवं चान्द्रायण व्रत आदि के द्वारा विधानपूर्वक सम्यक् प्रकार से शुद्ध करें, इससे वह साधक इन्द्रियों के द्वारा पराजित नहीं होता है। यदि तैरभिभूतः स्यात् स्वस्यापि प्रियमप्रियम् ॥ २६ ॥ न वेत्ति विषयाविष्टो नरकं प्रतिपद्यते । यदि वह शरीरादि से पराजित हो जाता है, तब अपन प्रिय और अप्रिय भी नहीं जान पाता है और विषय में लिप्त होकर नरक का भागी बनता है। ततः कर्मविपाकेन तरुगुल्मलतादिकम् ॥ २७ ॥ सम्प्राप्य कृमिकीटादिजन्तुत्वं प्रतिपद्यते ।¹ ग्रामारण्यपशुत्वं च यच्च यावच्चराचरम् ॥ २८ ॥ समुपेत्य विनष्टात्मा मानुष्यं प्रतिपद्यते ।² ऐसा होने पर कर्म के परिणामस्वरूप वृक्ष, झुरमुट, लता आदि के रूप में तथा कीड़े-मकोड़े के रूप में जन्तु का शरीर प्राप्त करता है। वह पालतू और जंगली जानवर के रूप जन्म लेकर जितने स्थावर और जंगम प्राणी हैं, उसके रूप में जन्म लेते हुए आत्मज्ञान के नष्ट हो जाने पर मनुष्य की योनि में जन्म लेते हैं। ततः पुराकृतं स्वस्य दुःखदं कर्म विस्मरन् ॥ २९ ॥ करोत्यनिष्टं सततं हितं नैव समाचरेत् । ततोऽयन्नारकी भूत्वा पुनरेवं प्रपद्यते ॥ ३० ॥
- घ. में अनुपलब्ध। 2. घ. मनुष्यत्वं प्रपद्यते ।