भारतकोश
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

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पृष्ठ 217

(156) अगस्त्य-संहिता भूयो भूयोऽप्येवमेव चक्रवत्परिवर्तते। तब पूर्वजन्म में अपने किये गये दुःखप्रद कर्मों को भूलते हुए हमेशा गलती ही करता रहता है और कल्याणकारी कार्य नहीं करता है। तब वह जीव नरक प्राप्त कर फिर इसी प्रकार उत्पन्न होता है। बार बार इसी प्रकार चक्र के समान परिवर्तन होता रहता है। विहितं च निषिद्धं च सः कर्म विदधीत वै।।31।। संसारान्न निवर्तन्ते कदाचिदपि दुःखितः। अतः शास्त्र में जिस कर्मकाण्ड का विधान किया गया है अथवा जिसे निषिद्ध माना गया है, उन्हें जो करते हैं, वे दुःखी इस संसार से छुटकारा नहीं पाते हैं। न ज्ञानव्यतिरेकेण मुक्तये साधनान्तरम्।।32।। सुतीक्ष्ण विद्यते तत्त्वज्ञाननिष्ठो भवानघ। तद्योगेनैव भवति योगोऽप्यभ्यासपूर्वकः।।33।। अभ्यासोऽपि यमाद्यैश्च जायते नान्यथा मुने। अतः हे निष्पाप सुतीक्ष्ण! ज्ञान को छोड़कर मुक्ति का दूसरा साधन कुछ भी नहीं है, अतः तत्त्व का ज्ञान प्राप्त करो। यह ज्ञान योग से होगा तथा योग भी अभ्यास करने से होगा। यह योगाभ्यास भी यम आदि का पालन करने से होगा अन्य विधि से नहीं। अधीत्य वेदशास्त्राणि¹ विरक्तैः सात्त्विकैश्च तैः।।34।। यमादयोऽनुष्ठीयन्ते त्यक्तदेहाभिमानिभिः। वेद और शास्त्रों का अध्ययन कर विरक्त और सात्त्विक प्रवृत्ति के लोगों द्वारा अपने शरीर का अभिमान छोड़ देने पर यमादि का पालन किया जाता है। स्वदेहाभिमानोऽपि तेषामेव न विद्यते।35।। नित्यानित्यार्थतत्त्वज्ञाः शान्ताश्च यतयोऽपि ये। यह नित्य है और यह अनित्य है, इसका जिन्हें ज्ञान हो गया है, ऐसे शान्त यती को ही अपने शरीर का अभिमान नहीं रहता है। मुक्तये न परो मार्गो मुक्तये न परन्तपः।।36।। मुक्तये न परं ध्यानं ततोऽन्यन्नास्ति किञ्चन।


  1. घ. वेदशास्त्रार्थ।