अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वाविंशोऽध्यायः (157) मुक्ति के लिए दूसरा कोई मार्ग नहीं, दूसरा कोई तप नहीं, दूसरा कोई ध्यान नहीं। इस ज्ञान के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। यदि त्वमुपपद्यैव देहादौ ममतामपि।।37।। त्यज कर्माखिलं सम्यक् यदि मुक्तिमपेक्षसे। इस प्रकार, यदि मोक्ष चाहते हो, तो ज्ञान प्राप्त कर शरीर इन्द्रिय आदि के प्रति ममता का त्याग करो और सभी कर्मों का भी त्याग करो। जानीहि सम्यगात्मानमन्तरे त्वं निरन्तरम्।।38।। मूलाधारे च हृदये द्वादशान्ते स्थितो हि सः। यावदन्तर्बहिः सर्वं व्याप्य रामः प्रकाशते।।39।। देहादिषु गतेष्वेकं स्वयमेवावशिष्यते। ततस्त्वतः परं कञ्चिद् विद्यते न तपोधन।।40।। आत्मा को भलीभाँति जानो और हमेशा उसे अपने अन्तःकरण में स्थित जानो। वह परमात्मा मूलाधार, हृदय और द्वादश चक्र के अन्तस् में स्थित है। भीतर बाहर जो कुछ भी है, उनमें श्रीराम व्याप्त होकर उन्हें प्रकाशित करते हैं। शरीर आदि के नष्ट हो जाने पर भी एकमात्र श्रीराम शेष रह जाते हैं। हे तपोधन सुतीक्ष्ण! इसलिए इसके ऊपर कुछ भी नहीं है। श्रीराम परम सत्ता हैं। एवं च सति दुःखञ्च संसारोऽप्यस्थितो मुने। यतित्वव्यतिरेकेण यो यतेत स मूढधीः।।41।। दुःखात्यन्तनिवृत्तौ च विना वा ब्रह्मविद्यया। सर्वात्मना हि सर्वेभ्यो विषयेभ्यो निवर्तनम्।।42।। हे मुनि सुतीक्ष्ण! इस प्रकार श्रीराम को परम सत्ता के रूप में जान लेने पर दुःखमय यह संसार अस्तित्वहीन हो जायेगा। यति धर्म के बिना जो भी इसके लिए यत्न करते हैं, वे मूर्ख हैं। अथवा, ब्रह्मविद्या के बिना दुःखों की पूर्ण निवृत्ति के लिए तथा हर प्रकार से सभी विषयों से छुटकारा पाने के लिए भी जो यत्न करते हैं, वे मूर्ख हैं। ब्रह्मविद्यासमायुक्तं यतित्वं मुक्तिसाधनम्। तत्त्वतो न परं किञ्चित् साधनं मुक्तयेऽस्ति हि।।43।।