भारतकोश
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

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पृष्ठ 219

(158) अगस्त्य-संहिता

ब्रह्मविद्या से युक्त जो यति धर्म है, वह मुक्ति का साधन है। वस्तुतः इससे आगे ऐसा कोई साधन नहीं है, जो मोक्ष के लिए हो। अतस्तदयनं सर्वं मङ्गलं सर्वसिद्धिदम्। यथा भागीरथी गङ्गा सागरेण समं गता ।।44।। पुनाति पतितान् ब्रह्मविद्यापि भुवनत्रयम्। इसलिए वह समस्त मंगलमय तथा सारी सिद्धि देनेवाला मार्ग है। जैसे सगर के वंशज भगीरथ द्वारा लायी गयी गंगा पतितपावनी है, उसी प्रकार, ब्रह्म विद्या तीनो लोकों को पवित्र करती है। यतिदर्शनमात्रेण योगाभ्यासपरायण। ।।45।। सम्यग् ब्रह्मविदां श्रेष्ठ¹ निर्मली कुरुते जगत्। हे योगाभ्यास में लीन सुतीक्ष्ण! हे ब्रह्मज्ञानियों में श्रेष्ठ! यतियों के दर्शनमात्र से यह संसार पवित्र हो जाता है। प्रायश्चित्तं पुनात्याशु यथा द्वादशवार्षिकम् ।।46।। विधिवत् स्वीकृतं सम्यग् यतित्वं च तथा सताम्। ²अतः सर्वात्मना ब्रह्मकैवल्यं नित्यमभ्यसेत् ।।47।। जिस प्रकार, बारह वर्ष तक का प्रायश्चित्त शीघ्र पवित्र करता है, उसी प्रकार सज्जनों द्वारा आचरित विधानपूर्वक, शास्त्रानुमोदित सम्यक् यति धर्म पवित्र करता है। अतः सभी प्रकार से ब्रह्म-कैवल्य का नित्य अभ्यास करना चाहिए। इत्यगस्त्यसंहितायां परमरहस्ये ब्रह्मविद्यानिरूपणं नामैकविंशोऽध्यायः।। अथ द्वाविंशोऽध्यायः सुतीक्ष्ण उवाच। योगो नाम किमेतन्मे ब्रूहि योगविदां वर। चेतसो विजयः केनोपायेन स्यान्मुनीश्वर।।1।। सुतीक्ष्ण बोले- हे योगिराज! अगस्त्य! योग क्या है? यह मुझे बतलाएँ और मन पर विजय कैसे मिलेगा?

  1. घ. ब्रह्मविदश्चैव। 2. घ. में अनुपलब्ध। 3. घ. स्यात्तथा ततः।