अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 220, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वांविंशोऽध्यायः (159) अगस्त्य उवाच। समीरणाः शरीरान्तर्निरुद्धा येन यत्नतः³। मनोप्येवं निरुद्धः स्यात् तदात्मनि समीहते॥२॥ अगस्त्य बोले- 'जिस प्रकार के प्रयास से वायु शरीर के भीतर रोक लिए जाते हैं, उसी प्रयत्न से मन भी आत्मा में समाहित हो जाता है।' ज्ञानानन्दरसास्वादस्तस्मान्नैव निवर्त्तते। अनायासेन मनसो निश्चलत्वमुपेक्षसे॥३॥ तदापानं समुत्कृष्य प्राणेनानीय योज्यताम्। प्राणापानौ समौ कृत्वा¹ चित्तमप्यात्मनिस्थितम्॥४॥ सुखमास्वादयत्येव द्वादशार्णाब्जनिःसृतम्। तदास्वादं परः शश्वत् कदाचिदपि न त्यजेत्॥५॥ ज्ञानानन्द के रस का स्वाद पा लेने पर मन आत्मा से फिर लौटता नहीं। तब अनायास ही मन की निश्चलता की अपेक्षा होने लगती है। इसके बाद साधक प्राणवायु को खींचकर अपान वायु को भी खींच लेता है और अन्यत्र मन को नहीं लगाता है। तब प्राण और अपान वायु को समान कर चित्त को आत्मलीन कर द्वादशदल कमल से निःसृत अमृत के स्वाद को चख लेता है। इस परम स्वाद को एक बार पा लेने पर उसे कभी नहीं छोड़ता है। आदावेतानि जानीहि शरीरोत्पत्तिकारणम्। उत्पत्तिमथ संस्थानं क्रमं कर्त्तारमात्मनः॥६॥ सबसे पहले अपनी शरीरोत्पत्ति के ये कारण जानो। उत्पत्ति, स्थिति, उसका क्रम और कर्त्ता को जानो। अनादिरेव संसारोऽदृष्टमात्रं तु कारणम्। विधिस्तदनुरूपेण विद्यते निग्रहान् किल॥७॥ स्वस्यादृष्टैश्च बहुधा नानारूपेण भेदिताः। सर्वेषामपि संख्यातं तेषां नास्ति तपोनिधे॥८॥ आत्मानो बहवोऽनन्ताः श्रुतिरित्थमेवमब्रवीत्। अपने अपने भाग्य के फल के कारण अनेक प्रकार के अनेक रूपों में पृथक् किए गये जीव होते हैं। आत्मा के अनन्त रूप हैं- ऐसा श्रुति वचन है, इसलिए सभी जीवों की संख्या निश्चित नहीं है।
- घ. युक्तौ।