अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ
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(160) अगस्त्य-संहिता
संसारब्धेरनादित्वात् सम्यग्ज्ञानोदयावधि ।। ९ ।। एतावदप्यहोऽनन्तदुःखमेवानुभूयते । अनादि होने के कारण इस संसार रूपी दुःख को भी तबतक जीव अनुभव करता है, जबतक उसमें ज्ञान का उदय नहीं हो जाता। उद्भिज्जान्याण्डजान्ये हुः स्वेदजानि विपश्चितः ।। १० ।। जरायुजानि बहुधा चतुर्द्धा भेदितान्यपि। उद्भिज, अण्डज, स्वेदज और जरायुज, ये चार प्रकारों में बँटे जीव अनेक प्रकार से उत्पन्न होते हैं। सम्यङ््महीमधिष्ठायोद्भिज्जायत इत्यथ ।। ११ ।। पाञ्चभौतिकरूपाणि तृणादीनि तु तान्यथ। पत्रपुष्पफलस्कन्धशाखाभेदेन बोधत ।। १२ ।। अच्छी तरह पृथ्वि में रहने वाले तथा उसे भेदकर उगनेवाले पाँच भूतों के स्वरूप तृण आदि भी जो हैं, वे भी शरीर रूप हैं, जिन्हें पत्र, पुष्प, फल, तना और डाल के रूप में भिन्नता लिए जानो। अण्डजान्यपि गोधादिरूपेणैषामवस्थितिः। सुप्रसिद्धे च चान्यानि स्वेदजानि तपोनिधे ।। १३ ।। यूकाकीटादिरूपाणि प्रक्षीयन्ते क्षणे क्षणे। छिपकिली आदि के रूप में जिनकी अवस्थिति होती है, वे अण्डज हैं तथा दूसरे स्वेद से उत्पन्न स्वेदज जूँ, कीड़े आदि रूप में क्षण क्षण नष्ट होते हैं। ये दोनों रूप प्रसिद्ध हैं। जरायुजान्यथोत्पत्तिं प्राप्नुवन्ति प्रभावतः ।। १४ ।। स्वस्यादृष्टस्य पक्वस्य भुक्तिप्रक्षीणस्य चात्मनः। स्त्रीपुंसोर्ग्राम्यधर्मेण जायेते शुक्रशोणिते ।। १५ ।। तदुक्तरसरूपेण देहमस्य¹ प्रजायते। अब जरायुजों के विषय में कहता हूँ कि अपने अदृष्ट का फल जब पक जाता है और भोग शेष हो जाता है, तब उसके प्रभाव से जन्म लेते हैं। स्त्री और पुरुष के संभोग से शुक्र और शोणित उत्पन्न होते हैं, उस कहे गये रस के रूप में इसका शरीर उत्पन्न होता है।
१. घ. तत्त्वमस्य। २. घ. वाय्वग्निजलेदेहजः।