अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 198, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ें(137) एकोनविंशोऽध्यायः जिस प्रकार विधि और निषेध दोनों मुक्ति की ओर ही जाते हैं, उसी प्रकार विधिपूर्वक रामोपासक को वे दोनों स्पर्श भी नहीं कर पाते। सदा रामोऽहमित्येव चिन्तयेदप्यनन्यधीः। न तस्य विहितं लोके निषिद्धं च न विधीयते।।२८।। 'मैं सदा श्रीराम हूँ' ऐसा एकाग्र होकर सोचें। ऐसे व्यक्ति के लिए संसार में कोई विधान अथवा निषेध नहीं रह जाता है। यथा घटश्च कलश एकार्थस्याभिधायकः। तथा ब्रह्म च रामश्च नूनमेकार्थतत्परः।।२९।। जैसे 'घट' शब्द एवं 'कलश' शब्द दोनों एक ही पदार्थ का अभिधान करते हैं। उसी प्रकार 'ब्रह्म' और 'राम' शब्द का एक ही अर्थ होता है। अतो रामोऽहमित्येव तात्पर्यं प्रवदन्ति ये। रामनामत एव स्युर्न तेषां विहितादिकम्।।३०।। इसलिए 'मैं राम हूँ' यही भाव जो बोलते हैं, वे श्रीराम के नाम के कारण राम ही हो जाते हैं, उनके लिए विधि-निषेध आदि नहीं होते। दातव्यमस्मै ददति ये यावत्किञ्चिदन्वहम्। उदकौदनवस्त्राणि रामायैव न संशयः।।३१।। अतो ब्रह्मविदे दत्तमानन्त्याय प्रकल्प्यते। 'ऐसे भक्त को यह दे रहा हूँ' ऐसा सोचकर जो जितनी मात्रा में जल, भात, वस्त्र आदि दान करते हैं, वे राम को ही समर्पित करते हैं, इसमें सन्देह नहीं। इसलिए ब्रह्मज्ञानी को दिया गया दान अनन्त फल देनेवाला होता है। ये दुष्यन्त्यपि निन्दन्ति तत्पापफलभागिनः।।३२।। ¹कुटुम्बिनो दरिद्राः स्युर्दुःखिनः स्युर्न संशयः। जो ब्रह्मज्ञानियों का दोष निकालते हैं, उनकी निन्दा करते हैं, वे उस पाप के भागी होते हैं। वे दुःखी होते हैं तथा उनके परिवार के लोग भी दुःखी होते हैं। ततः सुतान् समुत्पाद्य स्वयमेव दहेदपि।।३३।। कारागृहेषु सर्वेषु निर्निमित्तं निगृह्यते। तब वे अनेक पुत्रों को उत्पन्न कर स्वयं भी जलते रहते हैं तथा सभी प्रकार के बन्धन रूपी कारागार में विना किसी कारण के बाँधे जाते हैं।
- घ. यहाँ से दो श्लोक तक क. में अनुपलब्ध। 2. घ. कृतेप्सुभिः। Rarest Archiver