भारतकोश
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

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पृष्ठ 197

(136) अगस्त्य-संहिता भोग के साधनों का हृदय के साथ जो अत्यन्त संयोग है, वह संसार में भोग कहा जाता है। इस प्रकार दोनों एक दूसरे से अलग है। तथाथात्मानुसन्धानमुभयत्रापि दृश्यते।।22।। मुक्तिरात्मानुसन्धाने चात्मावस्थानमेव हि। एतदस्त्येव तत्त्वञ्च सर्वतत्त्वविदां सताम्। ।23।। प्रवृत्तौ च निवृत्तौ च सर्वदात्मानुभाविनाम्। चूँकि आत्मा का अनुसंधान दोनों ही स्थलों पर है और आत्मा के अनुसंधान के द्वारा आत्मा में स्थित होना मुक्ति है। हे तत्त्वज्ञ! यही कारण है कि प्रवृत्ति और निवृत्ति दोनों में हमेशा आत्मा का ही अनुभव होता है, यही दोनों में साम्य है। किञ्च रामोऽहमित्येव सर्वदानुस्मरन्ति ये।।24।। न ते संसारिणो नूनं राम एव न संशयः। और भी, 'मैं राम हूँ' ऐसा जो हमेशा चिन्तन करते हैं, वे संसारी न होकर राम-स्वरूप हो जाते हैं, इसमें सन्देह नहीं। राम एवात्र भोक्ता च भोग्यमाद्यं¹ भुजि क्रिया।।25।। एतस्मिन्नविशिष्टे तु किमसत् सत्रसंजनम्। अतो न मुक्तिमार्गस्य रोधिनी भुक्तिरिष्यते।।26।। हे आर्य सुतीक्ष्ण! श्रीराम ही भोक्ता हैं, प्रथम भोग्य हैं तथा भोजन रूप क्रिया भी वे ही है। उनके अविशिष्ट अर्थात् सामान्य अर्थात् सबमें उपस्थित रहने पर कौन सा असत् उत्पन्न हो सकता है? अतः भोग मोक्ष के मार्ग का अवरोधक नहीं है। अनेन विधिना रामं य एवमनुतिष्ठति। स भुक्तिमपि मुक्तिञ्च लभते नात्र संशयः।।27।। इस विधि से जो श्रीराम का अनुष्ठान करते हैं, वे भोग और मोक्ष दोनों प्राप्त करते हैं, इसमें सन्देह नहीं। यथा विधिनिषेधौ तु मुक्तिं नैवापसर्पतः। तथा न स्पृशतो रामोपासकं विधिपूर्वकम्।।28।।

  1. क. एवं घ. भोज्यमाद्यं।