अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 192, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ेंअष्टादशोऽध्यायः (131) पादद्वयं समं ⁃ सम्यगूरुमूलद्वयोपरि ।।47।। कृतं पद्मासनं ह्येतच्छ्रेष्ठं सर्वेषु कर्मसु। दोनों पैरों को भली भाँति जंघा की जड़ के ऊपर रखकर किया गया पद्मासन सभी कर्मों में श्रेष्ठ है। वामपादे निधायाङ्कं मूलं पादं च दक्षिणम्। वामाङ्गाग्रे दृतिर्ह्येतद्¹ वीरासनमुदीरितम् ।।48।। बाँये पैर को जमीन पर टिकाकर घुटना पर बाँयी केहुनी को टिका लें। तथा बायें पैर को मोड़कर भूमि पर रखें। इस स्थिति में वाँयीं ओर दृष्टि केन्द्रित करने पर वह वीरासन कहलाता है। योगासनं चमूष्काधः पाणिं दत्वा पदान्तरम्। जङ्घाद्वयोर्निधायैतद्योगेभीष्टं प्रयच्छति ।।49।। (यहाँ भी पाठ सन्देहास्पद है। अन्यत्र विवरण के अनुसार पद्मासन में बैठकर दोनों ऐँड़ियों को पेट से दबाकर दोनों जंघाओं को एक समान रखकर आगे की ओर कपाल को भूमि से सटाने पर योगासन होता है।) वामाङ्कपाश्र्वे पाणिञ्च दक्षिणं चेतरं पुनः। पाष्ण्र्यन्तरं विधायैवं कुर्याज्जानुद्वयं समम् ।।50।। गोमूत्रासनमेतत् स्यात् सर्वाघौघविनाशनम्। बायीं काँख के को बायीं ऐंड़ी पर तथा दायें काँख को दायीं एड़ी पर टिकाकर दोनों जंघाओं को समानान्तर कर लें। यह गोमूत्रासन कहलाता है, जिससे सभी पाप विनष्ट हो जाते हैं। आसनानि बहूनि स्युरेवमेव जपादिषु ।।51।। येन केनासनेनैव वीरः स्थित्वा जपादिकम्।¹ इस प्रकार जप आदि में अनेक आसन है। किसी भी एक आसन में वीर की तरह निर्वाह करते हुए जप आदि करें। कुर्वीत भक्तियुक्तस्तु भावयेत् पुरुषोत्तमम्।। एवं यः कुरुते पूजाजपहोमादिकं मुने ।।52।। सर्वेषामिह पूज्योऽयमिह लोके परत्र च।
- क. में अनुपलब्ध।