अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 191, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ें(130) अगस्त्य-संहिता मुद्रा योनिसमाख्याता स्यात् करद्वयदर्शिता ।।41।। तर्जन्याकृष्टमध्यान्ता स्थितानामिकयुग्मका। मध्यमूलस्थिताङ्गुष्ठा ज्ञेया शस्तार्चने मुने।।42।। योनि नामक मुद्रा दोनों हाथों से दिखायी जाती है। दोनों मध्यमाओं के नीचे से बायीं तर्जनी के ऊपर दाहिनी अनामिका और दाहिनी तर्जनी के ऊपर बायीं अनामिका रखकर दोनों तर्जनियों से बाँधकर दोनों मध्यमाओं को ऊपर रखने से यह मुद्रा बनती है, जो देवताओं की अर्चना में प्रशस्त है। एताभिर्दशमुद्राभिः पूर्वोक्ताभिश्च सप्तभिः। यो रामर्चयेन्नित्यं मोदयेत् स सुरेश्वरम् ।।43।। द्रावयेदपि¹ विप्रेन्द्र ततः प्रार्थितमाप्नुयात्। पूर्व में कही गयी सात तथा यहाँ कही गयी दश मुद्राओं से जो नित्य श्रीराम की अर्चना करते हैं, वे देवों के ईश्वर विष्णु को प्रसन्न करते हैं, उन्हें द्रवित भी करते हैं और प्रार्थना की गयी वस्तु प्राप्त करते हैं। लक्षण्यान्यासनानां हि वक्ष्यामि मुनिसत्तम ।।44।। तानि स्वस्तिकभद्राब्जवीरादीनि भवन्ति वै। हे मुनिश्रेष्ठ! अब मैं आसनों का लक्षण कहता हूँ। आसन स्वस्तिक, भद्रासन, पद्मासन, वीरासन आदि अनेक प्रकार के होते हैं। कृत्वोत्तानौ क्षितौ पादौ तत्रैवोरुद्वयं समम् ।।45।। निधाय निश्चलं ह्येतत् स्वस्तिकं कीर्त्यते मुने। दोनों पैरों को पृथ्वी पर अपने सामने फैलाकर दोनों जंघाओं को समान कर अविचल होकर बैठें। यह स्वस्तिक मुद्रा कहलाती है। ( प्रयोग में बायें पैर को दायीं जंघा की मांसपेशियों के बीच तथा दायें पैर को बांयी जंघा के बीच फंसाकर स्थिर होकर बैठने से यह आसन बनता है। पादद्वयं समं जानुद्वयोरपि तु कारितम् ।।46।। भद्रासनमिदं श्रेष्ठं जपेत् तत्तत् फलप्रदम्। दोनों पैरों को समान रूप से दोनों घुटना के ऊपर करने से वज्रासन कहलाता है। इस श्रेष्ठ आसन में जो जप किये जाते हैं वे फलदायी होते हैं।
- आचार्य रामकिशोर कृत 'मुद्राप्रकाश' नामक ग्रन्थ में 'मोदयन्ति द्रावयन्ति देवान् इति मुद्राः' यह परिभाषा दी गयी है।