अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 136, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वादशोऽध्यायः (75)
जो तत्त्वविन्यास करता है, वह तत्त्व ही हो जाता है। इन स्थानों में आत्मस्वरूप में प्रवेश कर भगवान् अवस्थित होते हैं; क्योंकि तत्त्व वही है, जिसमें सबकुछ अवस्थित है। तन्मूर्तिपञ्जरं न्यासस्तस्य तन्मूर्तिसिद्धये। आकर्ण्यैकचित्तः सन् यतोऽस्ति न फलान्तरम् ।। ५० ।। भगवान् मूर्तिरूपी शरीर का यह न्यास उनके स्वरूप की सिद्धि के लिए एकाग्र होकर सुनो; क्योंकि इससे अधिक फल कही भी नहीं है। नमो भगवते ब्रूयाद् वासुदेवाय इत्यथ। ॐआदिरस्य¹ मन्त्रस्य आदायैकाक्षरं ततः ।। ५१ ।। एकैकमक्षरं तद्वत् श्रीरामाख्यमनोरपि। द्विरावृत्याक्षरादानं विष्णोर्द्वादशनामसु ।। ५२ ।। नामैकैकमुपादाय सूर्यस्यापि च नामसु। सबसे पहले ॐ नमो भगवते कहें। इसके बाद वासुदेवाय कहें। फिर इस मन्त्र के ॐकारसहित इस मन्त्र के एक एक अक्षर लें। इसी प्रकार श्रीराम के षडक्षर मन्त्र दो-दो बार लेकर विष्णु के बारह नामों में से एक-एक नाम जोड़कर फिर सूर्य के बारह नामों में से भी एक-एक नाम लगाकर मन्त्र बनायें। ओमन्तश्च स्वरस्तद्वद् वासुदेवाक्षरं ततः ।। ५३ ।। श्रीराममन्त्रवर्णश्च ततः स्युः केशवादयः। धात्रादयो नमोऽन्तोयं न्यस्तव्यो न्यासयोगतः ।। ५४ ।। इस मन्त्र में सबसे पहले ॐकार, तब स्वर-वर्ण, तब उसी प्रकार वासुदेव- मन्त्र के वर्ण, तब श्रीराममन्त्र के वर्ण तब केशव आदि बारह नाम, तब धाता आदि सूर्य के नाम तब अन्त में नमः लगाकर न्यास के योग से अङ्गन्यास करें। ललाटे नाभिहृदये कण्ठपार्श्वांशकन्धरे। पार्श्वान्तरांशे स्कन्धे च पृष्ठे ककुदि च क्रमात् ।। ५५ ।। इस मन्त्रों को क्रमशः ललाट, नाभि, हृदय, कण्ठ, पार्श्वभाग, कन्धर, वामपार्श्व, दक्षिणपार्श्व, स्कन्ध, पृष्ठ, ककुत् में न्यास करें।
- घ. ओमादावस्य मन्त्रस्य। Rarest Archiver