अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 112, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ेंदशमोऽध्यायः (51)
यह मालामन्त्र कहा जाता है जो साधकों के लिए 'चिन्तामणि के रूप में धारण किया जाता है।' ॐ श्रीं सीतायै' के साथ वह्निजाया (स्वाहा) लगाकर सीतामन्त्र है। यन्त्रेऽस्मिन् राममाराध्य साङ्गावरणमादरात्। आराध्य गुलिकीकृत्य ¹ धारयेद्यन्त्रमन्वहम्।।24।। इस यन्त्र पर आदरपूर्वक अंग-पूजा और आवरण-पूजा के साथ श्रीराम की आराधना कर इस यन्त्र को मोड़कर गोल बनाकर प्रतिदिन धारण करना चाहिए। दारिद्र्यदुःखशमनं पुत्रपौत्रप्रदन्तथा। ऐश्वर्यकृद् वश्यकरं शत्रुसंहारकारकम्।।25।। विद्याप्रदं सौख्यकरं रोगशोकनिवारणम्।।26।। पराभिचारकृत्येषु वज्रपञ्जरमुच्यते। किं मन्त्रं बहुनोक्तेन सर्वसिद्धिप्रदं मुने।।27।। यह यन्त्र दारिद्र्य और दुःख का शमन करता है; पुत्र और पौत्र प्रदान करनेवाला है, ऐश्वर्य देता है, सबको वश में ला देता है शत्रुओं का संहार करता है। यह विद्या देनेवाला, सुख देनेवाला, रोग और शोक को हटानेवाला है। दूसरे पर अभिचार कर्मों में 'वज्रपंजर' कहलाता है। अनेक बार मन्त्र जपने से क्या लाभ? यह यन्त्र ही सभी सिद्धियों को प्रदान करनेवाला है। इत्यगस्त्यसंहितायां यन्त्रविधिर्नाम नवमोऽध्यायः।।9।। दशमोऽध्यायः अगस्त्य उवाच पूजाविधानं वक्ष्यामि नारदाभिमतं च यत्। वाल्मीकये मुनीन्द्राय द्वारपूजादिकं तथा।।1।। आकर्णय मुनिश्रेष्ठ सर्वाभीष्टफलप्रदम्।।2।। अगस्त्य बोले- हे मुनि श्रेष्ठ सुतीक्ष्ण! नारद ने मुनिश्रेष्ठ वाल्मीकि को जो पूजा तथा द्वार पूजा विधि बतलायी थी वह में कहता हूँ, उसे सुनो इससे सभी मनोरथ सफल हो जाते हैं।
- क. गुटिकीकृत्य।