भारतकोश
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

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पृष्ठ 109

(48) अगस्त्य-संहिता यन्त्रेणापूजितो रामः सहसा न प्रसीदति। श्रीरामः पूजितो नित्यं सीतया सह यन्त्रितः।।4।। यदिष्टं तत्करोत्येव तत्तन्मन्त्रवरादृते। यन्त्र के बिना पूजित राम शीघ्र प्रसन्न नहीं होते हैं। किन्तु श्री सीता के साथ यन्त्र पर निर्दिष्ट श्रीराम पूजित होकर उस मन्त्रराज के बिना भी इष्ट सिद्धि करते हैं। शरीरमिव जीवस्य रामस्य मनुरुच्यते।।5।। यन्त्रे मन्त्रं समाराध्य यदभीष्टं तदाप्नुयात्।¹ ²यन्त्रे मन्त्रं समाराध्य प्रसादयति राघवम्।।6।। जैसे जीव का आश्रय शरीर होता है, उसी प्रकार श्रीराम मन्त्र में विराजमान होते हैं। यन्त्र पर मन्त्र की आराधना करने से कामना की पूर्ति होती है तथा श्रीराम प्रसन्न होते हैं। ³सर्वेषामपि मन्त्राणां यन्त्रे पूजा प्रशस्यते। यन्त्रस्वरूपं वक्ष्यामि ब्रह्मा प्राह यथा पुरा।'।7।। सभी मन्त्रों की पूजा यन्त्र पर प्रशस्त मानी जाती है। ब्रह्मा ने जिस प्रकार प्राचीन काल में कहा था वैसा ही मैं भी कहता हूँ। आदौ षट्कोणमुद्धृत्य ततो वृत्तं लिखेन्मुने। दलानि विलिखेदष्टौ ततः स्याच्चतुरस्रकम्।।8।। सबसे पहले षट्कोण लिखकर तब वृत्त लिखना चाहिए। इसके बाद आठ दल लिखकर चतुरस्र (वर्ग) बनाना चाहिए। सर्वलक्षणसम्पन्नं व्यक्तं सर्वमनोहरम्। तदन्तरेऽपि सुव्यक्तं साध्याख्या कर्मगर्भितम्।।9।। सभी लक्षणों से युक्त, स्पष्ट और सुन्दर यन्त्र लिखकर उसके मध्य में स्पष्ट अक्षरो में अभीष्ट वस्तु और कर्म लिखना चाहिए। तद्बीजं विलिखेद् भूयस्तत् क्रोडीकृतमन्मथम्। ततस्तु पञ्चबीजानि पुनरावर्तयेन्मुने।।10।। पुनर्दशाक्षरेणैव तदेव परिवेष्टयेत्।

  1. घ. समाप्नुयात्। 2-3. घ. में अनुपलब्ध। Rarest Archiver