अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनवमोऽध्यायः (47) हे मुनि सुतीक्ष्ण! ब्राह्मण आदि जाति के शिष्यों को उनके अनुरूप विधानपूर्वक पूजा कर सामर्थ्य के अनुसार सोने का या मिट्टी के नवीन कलश की स्थापना कर यह मन्त्र उसी प्रकार शिष्य को दें जैसे कोई दाता किसी को धन देता है। इत्यगस्त्यसंहितायां परमरहस्ये गुरुशिष्यलक्षणं नामाष्टमोऽध्यायः।।8।। अथ नवमोऽध्यायः सुतीक्ष्ण उवाच किं तन्मन्त्रं वद ब्रह्मन् स्वरूपन्तस्य चानघ। कैर्मन्त्रैर्वा कथं कुत्र लेख्यः किं तेन वा भवेत्।।1।। हे ब्रह्मन्! मुनि अगस्त्य! वह मन्त्र क्या है? इसका स्वरूप क्या है? किस मन्त्र से किस प्रकार और किस स्थान पर उपासना करनी चाहिए तथा अंकित करने योग्य यन्त्र कैसा है, यह सब हमें बतलायें। सुतीक्ष्ण उवाच किं तद्यन्त्रं वद ब्रह्मन् स्वरूपं चास्य चानघ। कैर्मन्त्रैर्वा कथं कुत्र जाप्यं किं तेन वा भवेत्।।1।। सुतीक्ष्ण बोले- हे मुनि अगस्त्य! वह यन्त्र क्या है, इसका स्वरूप क्या है और किन मन्त्रों से कैसे कहाँ जप करना चाहिए और उसका क्या फल मिलेगा? अगस्त्य उवाच मनोरथकराण्यत्र नियम्यन्ते तपोधन। कामक्रोधादिदोषोत्थदीर्घदुःखनियन्त्रणात् ।¹।2।। यन्त्रमित्याहुरेतस्मिन् रामः प्रीणाति पूजितः। यन्त्रं मन्त्रमयं प्राहुर्देवता मन्त्ररूपिणी।।3।। अगस्त्य बोले- यहाँ में मनोरथ पूरा करनेवाले यन्त्रों की विधि बतलाता हूँ। काम, क्रोध आदि दोषों से उत्पन्न दुःखों को नियन्त्रित करने के कारण इसे यन्त्र कहा जाता है। इसपर पूजित श्रीराम प्रसन्न होते हैं। मन्त्र से युक्त यन्त्र होता है, जिसमे मन्त्र-स्वरूप देवता स्वयं होते हैं।
- घ. कामक्रोधादिदोषोत्थदीर्घयन्त्रनियन्त्रणात्।